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8.31.2011

मारुति सुज़ुकी, मानेसर के आन्‍दोलनरत मज़दूरों की प्रबुद्ध मीडियाकर्मियों से अपील


आदरणीय मीडियाकर्मियों,

जिस वक्‍त दिल्‍ली में जन लोकपाल के मुद्दे पर आन्‍दोलन की सफलता का जश्‍न मनाया जा रहा था, ठीक उसी वक्‍त राजधानी दिल्‍ली के ऐन बगल में हज़ारों ग़रीब मज़दूरों के लोकतांत्रिक अधिकारों का गला घोंटा जा रहा था। आपको पता ही होगा कि किस तरह से भारत की सबसे बड़ी कार कम्‍पनी मारुति सुज़ुकी इंडिया लिमिटेड के मैनेजमेण्‍ट ने 29 अगस्‍त की सुबह से मानेसर, गुड़गांव स्थित कारख़ाने में जबरन तालाबन्‍दी कर दी है। मैनेजमेण्‍ट ने अनुशासनहीनता और 'काम धीमा करने' का झूठा आरोप लगाकर 11 स्‍थायी मज़दूरों को बर्खास्‍त कर दिया है और 10 को निलम्बित कर दिया है। कम्‍पनी ने एक निहायत तानाशाहीभरा और सरासर ग़ैरक़ानूनी ''उत्तम आचरण शपथपत्र'' (गुड कंडक्‍ट बॉण्‍ड) भी मज़दूरों पर थोप दिया है और यह फ़रमान जारी कर दिया है कि जो मज़दूर इस पर हस्‍ताक्षर नहीं करेगा उसे ''हड़ताल पर'' माना जाएगा और कारख़ाने में दाखिल नहीं होने दिया जाएगा।
इस पत्र के अन्‍त में बॉण्‍ड का पाठ दिया गया है, आप स्‍वयं उसे पढ़कर देख सकते हैं कि यह किस कदर अलोकतांत्रिक और निरंकुश है और भारत के संविधान में उल्लिखित मूलभूत अधिकारों का हनन करता है।
आपने यह भी पढ़ा और देखा ही होगा कि मारुति सुजु़की के हम मज़दूर किन परिस्थितियों में काम करते हैं। राज्‍य द्वारा पारित श्रम क़ानूनों के तहत हमें अपनी स्‍वतंत्र यूनियन बनाने का अधिकार है लेकिन कम्‍पनी के कहने पर हमें ग़ैरक़ानूनी तरीके से इस बुनियादी अधिकार से भी वंचित किया जा रहा है ताकि हम अपने साथ होने वाले अन्‍याय के विरुद्ध आवाज़ न उठा सकें।
आप लोगों ने अण्‍णा जी के आन्‍दोलन को अभूतपूर्व कवरेज और समर्थन दिया है। मीडिया के इस प्रचण्‍ड समर्थन और सहयोग के बिना यह आन्‍दोलन न इतना व्‍यापक हो सकता था और न ही इतना सफल। आप लोग जनता के अधिकारों और न्‍याय तथा लोकतंत्र की बात करते हैं। क्‍या इन घनघोर अलोकतांत्रिक कार्रवाइयों के विरुद्ध मज़दूरों के संघर्ष को आपका समर्थन और सहयोग नहीं मिलेगा? क्‍या मज़दूरों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित करना भ्रष्‍टाचार नहीं है? क्‍या सरकार और कम्‍पनी मैनेजमेण्‍ट की यह मिलीभगत जनता के प्रतिनिधियों द्वारा जनता से विश्‍वासघात और भ्रष्‍टाचार का मामला नहीं है? क्‍या इस संघर्ष को मात्र इतनी कवरेज मिलेगी कि दिन में एक-दो बार कुछ सेकंड का समाचार दे दिया जाये जिसमें इस बात की चिन्‍ता अधिक हो कि मज़दूरों के आन्‍दोलन के कारण कम्‍पनी को कितना घाटा हो रहा है? हमें ऐसी कोई रिपोर्ट देखने को नहीं मिली जिसमें जन लोकपाल आन्‍दोलन के कारण देश में उत्‍पादन को हुए घाटे का हिसाब लगाया हो। फिर मज़दूरों के साथ ही यह दोहरा रवैया क्‍यों?
साभार : हिंदू बिज़नस लाइन
यह प्रश्‍न केवल मारुति के एक कारखाने के 3000 मज़दूरों का नहीं है। गुड़गांव के लाखों मज़दूरों और देशभर के करोड़ों मज़दूरों के साथ रोज़ यही सलूक होता है। गुड़गांव और उसके आसपास फैले विशाल औद्योगिक क्षेत्र में स्थित सैकड़ों कारख़ानों में कम से कम 20 लाख मज़दूर काम करते हैं। अकेले आटोमोबाइल उद्योग की इकाइयों में करीब 10 लाख मज़दूर काम करते हैं। अत्‍याधुनिक कारखानों में दुनिया भर की कंपनियों के लिए आटो पार्ट्स बनाने वाले ये मज़दूर बहुत बुरी स्थितियों में काम करते हैं। इनमें से 90 प्रतिशत से भी अधिक ठेका मज़दूर हैं जो 4000-5000 रुपये महीने पर 10-10, 12-12 घंटे काम करते हैं, काम की रफ़्तार और बोझ बेहद अधिक होता है और लगातार सुपरवाइज़रों तथा सिक्‍योरिटी वालों की गाली-गलौज और मारपीट तक सहनी पड़ती है।
हम आपसे और सभी मीडिया कर्मियों से अपील करते हैं कि अन्‍याय और निरंकुशता के विरुद्ध मूलभूत  लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए इस संघर्ष में हमारा साथ दें। आप मीडियाकर्मी के साथ ही एक प्रबुद्ध और ज़ि‍म्‍मेदार नागरिक भी हैं। हम चाहते हैं कि मज़दूरों की न्‍यायसंगत मांगों को स्‍वीकार करने के लिए आप सरकार पर भी दबाव डालें। हम आपको कारखाना गेट पर धरना स्‍थल पर भी आमंत्रित करते हैं।
अग्रिम धन्‍यवाद और सादर अभिवादन सहित,

-- बिगुल मज़दूर दस्‍ता तथा मारुति सुज़ुकी एवं गुड़गांव के विभिन्‍न कारख़ानों में काम करने वाले कुछ मज़दूर
संपर्क: सत्‍यम (9910462009), रूपेश (9213639072),  सौरभ (9811841341)
                                                              http://www.petitiononline.com/MSIL298/petition.html
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उत्तम आचरण का शपथपत्र
प्रमाणित स्‍थायी आदेश के अनुच्‍छेद 25(3) की शर्तों के अनुसार
मैं,…………………………………. सुपुत्र, श्री  ................स्‍टाफ संख्‍या.................एतदद्वारा स्‍वेच्छा से और बिना किसी दबाव में आए, प्रमाणित स्‍थायी आदेश के अनुच्‍छेद 25(3) के अनुसार इस उत्तम आचरण शपथपत्र को लागू करता हूं और इस पर हस्‍ताक्षर करता हूं। मैं शपथ लेता हूं कि अपनी ड्यूटी ज्‍वाइन करने पर मैं अनुशासनबद्ध होकर सामान्‍य उत्‍पादन कार्य करूंगा और मैं धीमे काम नहीं करूंगा,  बीच-बीच में काम नहीं रोकूंगा, कारख़ाने के भीतर रुककर हड़ताल नहीं करूंगा, नियमानुसार काम (वर्क टु रूल) नहीं करूंगा, तोड़फोड़ या कारखाने के सामान्‍य उत्‍पादन को प्रभावित करने वाली अन्‍य किसी गतिविधि में भाग नहीं लूंगा। मुझे ज्ञात है कि धीमे काम कम करना, बीच-बीच में काम रोकना, कारख़ाने के भीतर रुककर हड़ताल करना (), या सामान्‍य उत्‍पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली कोई भी गतिविधि प्रमाणित स्‍थायी आदेश के तहत गंभीर दुराचरण की श्रेणी में आती है और ऐसा कोई भी कार्य करने पर प्रमाणित स्‍थायी आदेश के अनुच्‍छेद 30 के तहत दिए जाने वाले दंड में,  बिना नोटिस के काम से निकाला जाना शामिल है। अत:, मैं एतदद्वारा सहमति देता हूं कि यदि, ड्यूटी ज्‍वाइन करने के बाद, मुझे काम धीमा करने, बीच-बीच में काम रोकने, स्‍टे-इन स्‍ट्राइक करने,  वर्क टु रूल करने, तोड़फोड़ या सामान्‍य उत्‍पादन को बाधित करने वाली किसी भी अन्‍य गतिविधि में शामिल पाया जाता है, तो मुझे प्रमाणित स्‍थायी आदेश के तहत सेवा से  बर्खास्‍त किया जा सकता है।

दिनांक :........................                                                      कर्मचारी के हस्‍ताक्षर

5.12.2011

मीडिया के अपने मित्रों का आभार और चंद बातें

मीडिया के अपने मित्रों का आभार और चंद बातें


प्रिय मित्रो,

पिछले 3 मई को गोरखपुर में अंकुर उद्योग के मालिक द्वारा मजदूरों पर गोलियां चलवाने और उसके बाद से मजदूर आंदोलन के दमन के सिलसिले में आपसे ख़तो-किताबत तथा बातचीत होती रही है। हमारी ओर से भेजी गई ईमेल आदि तथा अपने स्रोतों से आपको मालूम ही होगा कि मज़दूरों की एकता तथा देशभर में हुई निंदा और चौतरफा दबाव के बाद 9 तारीख़ की रात को गोरखपुर का प्रशासन व अंकुर उद्योग का मालिक झुकने को मजबूर हो गए। फिलहाल अंकुर उद्योग के मालिक ने कुछ मांगें मानी हैं और 18 मजदूरों को काम पर वापस रखा है तथा फैक्‍ट्री चालू हो गई है।

हालांकि अब भी वी.एन. डायर्स के दो कारखानों में तालाबंदी जारी है, सत्तर-अस्‍सी गुण्‍डों को लेकर मजदूरों पर गोलियां चलाने वाला प्रदीप सिंह अभी तक पकड़ा नहीं गया और ना ही मजदूरों पर से फर्जी मुकदमे वापस लिए गए हैं,न घायल मज़दूरों को मुआवज़ा घोषित हुआ है, न इस बर्बर गोलीकांड के लिए मालिक पर कोई कार्रवाई हुई है और न ही न्‍यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं। फिर भी, दमन-उत्‍पीड़न से मज़दूरों को राहत मिली है और मालिकान तथा प्रशासन पीछे हटने पर बाध्‍य हुए हैं, आगे के लिए बातचीत करने पर भी राजी होना पड़ा है।
निश्चित ही, इसके लिए मुख्‍य रूप से बधाई के पात्र गोरखपुर के मजदूर ही हैं जिन्‍होंने दमन का डटकर मुकाबला किया; लेकिन देशभर में हुई निंदा तथा जनदबाव का और मीडिया के आप सभी साथियों के सहयोग और समर्थन का इसमें बहुत बड़ा योगदान है। इसके लिए मैं 'गोरखपुर मजदूर आंदोलन समर्थक नागरिक मोर्चा' की ओर से मीडिया के सभी साथियों का आभार प्रकट करना चाहता हूं (दो वर्ष पहले गोरखपुर के मज़दूर आंदोलन के दमन के समय गठित इस मोर्चे में मैं शामिल रहा हूं)।
मैं लंबे समय तक देश के कई प्रतिष्ठित हिंदी अखबारों से जुड़ा रहा हूं और पिछले तीन साल से स्‍वतंत्र रूप से पत्रकारिता कर रहा हूं। मुझे इस बात का अहसास है कि तमाम ''दबावों'' के बावजूद मीडिया के साथियों ने जिस तरह इस पूरे मामले को अपने पत्र-पत्रिका/चैनल में स्‍थान दिया, वह काफी चुनौतीपूर्ण रहा होगा। चौतरफा निंदा और मीडिया की खबरों से गोरखपुर के मालिकान-प्रशासन पर जो दबाव बना है उसमें आप सभी का योगदान सराहनीय है।
लेकिन, मैं एक बात की ओर ध्‍यान दिलाना चाहूंगा। दो साल पहले भी गोरखपुर में मजदूरों का आंदोलन चला था। उस समय भी जनदबाव और मीडियाकर्मियों के सहयोग के कारण मालिकान-प्रशासन-राजनेता गठजोड़ को झुकना पड़ा था। लेकिन उस समय तीन-चार बार किए गए समझौते आज तक लागू नहीं हुए। अगुआ मजदूरों को चुन-चुन कर प्रताड़ि‍त किया गया तथा समय बीतने के साथ झूठे आरोप लगाकर एक-एक करके उन्‍हें निकाल बाहर किया। और इस बार भी मालिक-प्रशासन ऐसा ही कर सकते हैं। हालत यह है कि चुपचाप सबकुछ सहकर काम करो, तो आप शांत, आज्ञाकारी, मेहनती, विकास को बढ़ावा देने वाले आदि-आदि हैं, वरना आप उकसावेबाज, माओवादी, नक्‍सलवादी करार दिए जाएंगे (वैसे हम मीडियाकर्मियों की स्थिति भी बहुत अच्‍छी नहीं है, और इस बात को आपसे बेहतर कौन जानता होगा?)। उस समय भाजपा के स्‍थानीय सांसद आदित्‍यनाथ ने लगातार मजदूरों और उनके नेताओं के खिलाफ जहर उगला था और पहले तो इसे सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास किया तथा मजदूरों को कामचोर तक कहा। बाद में, थू-थू होने पर उन्‍होंने मजदूरों के नेताओं को निशाना बनाया और अखबारों में बयान जारी करके उन पर नक्‍सलवादी-माओवादी-बाहरी तत्‍व आदि का लेबल चस्‍पां करने लगे। प्रशासन भी मालिकों के सुर में सुर मिलाता रहा। (अभी मोहल्‍ला लाइव पर इस आंदोलन की खबर पर गौरव सोलंकी ने टिप्‍पणी की है कि ''मुझे एक बात याद आई। तहलका में जब मैंने गोरखपुर के मजदूरों की स्टोरी की थी पिछले साल, तब वहाँ के डिप्टी लेबर कमिश्नर को फ़ोन किया था उनकी राय जानने के लिए। उन्होंने कहा कि आपको जो करना है, कर लो। जहाँ श्रम विभाग के अधिकारी ही डॉन के लहजे में बात करते हैं, वहाँ स्थितियाँ कितनी भयावह हो सकती हैं, आप सोचिए।'') मज़दूर नेताओं को बातचीत के बहाने बुलाने के बाद मारा-पीटा गया और फर्जी मुकदमे तक दायर कर दिए। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उनका एनकाउंटर तक करने की कोशिश की गई। लेकिन उस समय भी जनदबाव और मीडिया में मौजूद साथियों की तत्‍परता के कारण वे इस घृणित कार्य को अंजाम नहीं दे सके।

5.11.2011

मजदूरों पर हमले के खिलाफ आमरण अनशन का एलान

81 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता कमला पांडेय ने मायावती को लिखी चिट्ठी

प्रति,
सुश्री मायावती जी,
मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश


विषय : गोरखपुर के मजदूरों के बर्बर दमन की अविलंब निष्पक्ष जांच की मांग तथा ऐसा न होने की स्थिति में आमरण अनशन की पूर्व सूचना



प्रिय मायावती जी,

मैं,कमला पांडेय, आयु 81 वर्ष, साठ वर्षों से गरीबों-मजलूमों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ती रही हूं और उप्र माध्यमिक शिक्षक संघ की स्‍थापना के समय से ही उसमें सक्रिय रही हूं। अब जीवन की सांध्य बेला में, हृदय रोग और शारीरिक अशक्तता के बावजूद अपनी सामाजिक सक्रियता जारी रखते हुए मैं बच्चों की संस्था ‘अनुराग ट्रस्ट’ चलाती हूं।

महोदया, गोरखपुर के मजदूरों पर पिछले दो हफ्तों से पुलिस-प्रशासन और उद्योगपतियों के गुंडों का जो बर्बर आतंकराज जारी है, उसकी खबरें मुझे विचलित करती रही हैं। फर्जी मुकदमे, गिरफ्तारी, लाठीचार्ज आदि की कार्रवाई तो अप्रैल से ही जारी है। 3 मई को ‘अंकुर उद्योग’ के मालिकों के गुंडों द्वारा अंधाधुंध गोलीवर्षा में 19 मजदूर जख्मी हुए, जिनमें से एक अभी भी जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहा है। आपके पुलिस प्रशासन ने गिरफ्तारी का बहाना बनाकर गुंडों को फैक्ट्री परिसर से बाहर निकालने का और मजदूर नेताओं पर नये फर्जी मुकदमे ठोंकने का काम किया। गोरखपुर के कमिश्नर वहां के भाजपा सांसद के सुर में सुर मिलाते हुए मजदूर नेताओं को ”बाहरी तत्व” और ”उग्रवादी” तक की संज्ञा दे रहे हैं। इन कर्मठ युवा नेताओं को मैं जानती हूं। ये मजदूर हितों के लिए संघर्षरत न्यायनिष्ठ लोग हैं।

महोदया, आज 9 मई को हजारों मजदूर दो फैक्ट्रियों की अवैध तालाबंदी समाप्त करने, मजदूरों से फर्जी मुकदमे हटाने और मजदूरों पर गोली चलाने की घटना की निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग को लेकर जब कमिश्नर कार्यालय की ओर शांतिपूर्ण ‘मजदूर सत्याग्रह’ शुरू करने जा रहे थे, तो उन पर बर्बर लाठीचार्ज और पानी की बौछार की गयी। शहर में कहीं भी उन्हें इकट्ठा होने से रोकने के लिए पुलिस ने आतंक राज कायम कर दिया। कई नेताओं, मजदूरों को हिरासत में ले लिया गया। इसके बावजूद, शाम 4 बजे मुझे सूचना मिलने तक कई सौ मजदूर टाउन हॉल, गांधी प्रतिमा के पास पहुंचकर अनशन की शुरुआत कर चुके थे।

मायावती जी, मजदूरों पर दमन का यह सिलसिला तो वास्तव में पिछले दो वर्षों से जारी है, जबसे वे कम से कम कुछ श्रम कानूनों को लागू करने की मांग कर रहे हैं।
आप स्वयं पता कीजिए कि गोरखपुर के कारखानों में क्या कोई भी श्रम कानून लागू होता है? यदि इनकी मांग उठाने वाले ”उग्रवादी” हैं तो मैं भी स्वयं को गर्व से ”उग्रवादी” कहना चाहूंगी। इस बार दमन और अत्याचार तो सारी सीमाओं को लांघ गया है। सत्ता में बैठे लोगों को यदि जनता निरीह भेड़-बकरी दीखने लगती है और इंसाफ की आवाज उनके कानों तक पहुंचती ही नहीं, तो इतिहास उन्हें कड़ा सबक सिखाता है।

मायावती जी, मैं विनम्रतापूर्वक आपको सूचित करना चाहती हूं कि यदि गोरखपुर के मजदूरों पर बर्बर अत्याचार बंद नहीं किया जाएगा, यदि मजदूरों पर गुंडों द्वारा गोली वर्षा के मामले की निष्पक्ष जांच नहीं होगी, यदि अवैध तालाबंदी खत्म करने के लिए प्रशासन मालिकों को बाध्य नहीं करेगा और यदि मजदूरों की

न्यायसंगत मांगों पर विचार नहीं किया जाएगा, तो मैं स्वयं व्हीलचेयर पर बैठकर मजदूर सत्याग्रह में हिस्सा लेने जाऊंगी। किसी लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण प्रतिरोध के लिए शासन से इजाजत लेना मैं जरूरी नहीं समझती। यदि न्याय की आवाज की अनसुनी की जाती रहेगी, तो आमरण अनशन करके प्राण त्यागना मेरे लिए गौरव की बात होगी। मुझे विश्वास है कि मेरे इस बलिदान से मजदूरों के संघर्ष को शक्ति मिलेगी और लोकतांत्रिक अधिकारों के संघर्ष में उतरने के लिए तथा न्याय की लड़ाई में शोषितों-दलितों का साथ देने के लिए बुद्धिजीवी समुदाय के अंतर्विवेक को भी झकझोरा जा सकेगा।


मायावती जी, मैं आपको धमकी या चेतावनी नहीं दे रही हूं। सत्ता की प्रचंड शक्ति के आगे मुझे जैसे किसी नागरिक की भला क्या बिसात? मैं आपसे अनुरोध कर रही हूं कि आप अपने स्तर से मामले की जांच कराकर न्याय कीजिए और सत्ता मद में चूर अपने निरंकुश अफसरों की नकेल कसिए। मैं इस न्याय संघर्ष में भागीदारी के अपने संकल्प की आपको सूचना दे रही हूं और विनम्रतापूर्वक बस यह याद दिलाना चाहती हूं कि लाठियों-बंदूकों से सच्चाई और इंसाफ की आवाज कुछ देर को चुप करायी जा सकती है, लेकिन हमेशा के लिए कुचली नहीं जा सकती।

साभिवादन,

भवदीया,
कमला पांडेय

दिनांक : 9/10/2011
संपर्क : डी 68, निरालानगर, लखनऊ 226020

गोरखपुर मजदूर गोलीकांड के विरोध में तैयार की गयी ऑनलाइन पिटिशन। कृपया आप भी हस्‍ताक्षर करें...


5.03.2011

गोरखपुर में फैक्‍ट्री मज़दूरों पर हमला - 20 मज़दूर गंभीर रूप से घायल

कृपया तुरंत कार्रवाई करें / बड़े पैमाने पर वितरित करें ...

गोरखपुर में फैक्‍ट्री मज़दूरों पर हमला - 20 मज़दूर गंभीर रूप से घायल

गोरखपुर (उ.प्र.) के बरगदवा औद्योगिक क्षेत्र की अंकुर उद्योग लि. नामक फैक्‍ट्री के मालिक द्वारा बुलाए गए गुण्‍डों ने आज (3 मई) सुबह मज़दूरों पर हमला किया। गुण्‍डों द्वारा की गई गोलीबारी से कम से कम 20 मज़दूर गम्‍भीर रूप से घायल हो गये हैं जिन्‍हें जिला अस्‍पताल में भरती कराया गया है। 

मज़दूरों ने फैक्‍ट्री को घेर रखा है ताकि गुण्‍डे निकल कर भाग न सकें। पुलिस बल घटनास्‍थल पर पहुंच गया है और फैक्‍ट्री गेट पर मौजूद है लेकिन उसने अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। उन्‍होंने अब तक प्राथमिकी भी नहीं दर्ज की है। अब तक 17 घायल मज़दूरों को ज़िला अस्‍पताल में भर्ती कराया गया है। उनके नाम हैं: 1. विनोद सिंह पुत्र श्री रामसरूप सिंह; 2. विरेन्‍द्र यादव पुत्र श्री मतिलाल यादव; 3. इन्‍द्रदेव पुत्र श्री बिलास दास; 4. अमित कुमार पुत्र श्री भूरे; 5. रमानन्‍द साहनी पुत्र श्री शीतला प्रसाद; 6. शैलेष कुमार पुत्र श्री रामाश्रय और 7. पप्पू जायसवाल, 8.रामजन्‍म भारत पुत्र श्री गुल्‍लू भारती, 9. विनय श्रीवास्‍तव पुत्र श्री तेज नारायण, 10. देवेंद्र यादव पुत्र श्री विजय नाथ, 11. विनोद दुबे पुत्र श्री केदारनाथ, 12. ध्रुव सिंह पुत्र श्री रामरूप सिंह, 13. श्रीनिवास चौहान पुत्र श्री बच्‍चा चौहान 14. संदीप मेहता पुत्र श्री बाबूलाल सिंह 15. राजेश गुप्‍ता पुत्र श्री लक्ष्‍मीकांत गुप्‍ता, 16. कृष्‍णकुमार पुत्र श्री रामकिशोर,17. शिवकुमार पुत्र श्री गिरजा राय.

साफ तौर पर यह उद्योगपतियों की तरफ से एक सुनियोजित हमला है। कुछ दिन पहले से ही मीडिया में एक दुष्‍प्रचार अभियान शुरू किया गया था जिसमें कहा गया था कि अपने बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्षरत मज़दूरों को बाहर से आये ''माओवादियों'' द्वारा भड़काया गया है। याद रहे कि दो साल पहले जब बरगदवा की 7 फैक्ट्रियों के मज़दूरों ने अपनी मांगों को लेकर एक संगठित आन्‍दोलन शुरू किया था उस समय भी इस प्रकार की अफवाहें फैलाने की कोशिश की गई थी। गोरखपुर के भाजपा सांसद योगी आदित्‍यनाथ फैक्‍ट्री मालिकों का खुले तौर पर समर्थन कर रहे हैं। वे शुरू से ही मज़दूरों के आन्‍दोलन का विरोध करते हुए मज़दूर नेताओं को ''हिंसा भड़काने पर तुले माओवादी'' कहते रहे हैं और पूरे मज़दूर आन्‍दोलन को यह कहकर बदनाम करते रहे हैं कि यह आन्‍दोलन ''चर्च के पैसे से चल रहा'' है।

गोरखपुर का प्रशासन खुलेआम फैक्‍ट्री मालिकों का पक्ष ले रहा है। गोरखपुर के कमिश्‍नर ने 5 दिन पहले ही बयान दिया था कि ''मज़दूरों को भड़काने वाले बाहरी तत्‍वों को बख्‍शा नहीं जायेगा और पुलिस उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करेगी।'' यह बयान गीडा (गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण) के फैक्‍ट्री मालिकों की एक बैठक के तत्‍काल बाद आया जिसमें मालिकों ने प्रशासन से ऐसा करने के लिए कहा था। यहां तक कि उन्‍होंने तीन प्रमुख मज़दूर कार्यकर्ताओं तपिश मेंडोला, प्रमोद कुमार और प्रशान्‍त को ''माओवादी'' बताया था और उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करने को कहा था। इन तीन कार्यकर्ताओं को पहले भी 2009 में फर्जी मामला बनाकर गिरफ्तार किया गया था और उन्‍हें तभी छोड़ा गया था जब गोरखपुर के ज़िला मैजिस्‍ट्रेट के कार्यालय पर आयोजित एक जबरदस्‍त जनप्रतिरोध ने प्रशासन को 4 दिन के लिए लगभग पंगु बना दिया।

उल्‍लेखनीय है कि गोरखपुर के उद्योगपति मज़दूर मांगपत्रक आन्‍दोलन के तहत दिल्‍ली में आयोजित मई दिवस की रैली में भाग लेने से मज़दूरों को रोकने के‍ लिए तरह-तरह के हथकण्‍डे इस्‍तेमाल कर रहे थे। झूठे मामलों में लगभग एक दर्जन मज़दूरों की गिरफ्तारी की गई थी और यहां तक कि वी एन डायर्स लिमिटेड नाम की एक फैक्‍ट्री में ताला बंदी कर दी गई थी। लेकिन मज़दूरों ने बड़ी संख्‍या में मई दिवस की रैली में भाग लेकर मालिकों को करारा जवाब दिया। गोरखपुर से लगभग 2000 मज़दूरों ने मज़दूर मांगपत्रक आन्‍दोलन के तहत मई दिवस की रैली में भाग लिया जिसमें देश के अलग-अलग हिस्‍सों से आये हज़ारों मज़दूरों ने भाग लिया था। इससे फैक्‍ट्री मालिकों और उनके राजनीतिक संरक्षक और भी बौखलाये हुए हैं और वे मज़दूरों को ''सबक़ सिखाने'' की कोशिश कर रहे हैं।

मीडिया के हमारे कुछ शुभचिन्‍तकों ने हमें सचेत किया है कि गोरखपुर का ज़िला प्रशासन मज़दूर नेताओं और अगुवा मज़दूरों को हिंसा की इस घटना में फर्जी ढंग से फंसाने और उन पर गम्‍भीर आरोप लगाकर उन्‍हें परिदृश्‍य से हटा देने की योजना बना रहा है ताकि आन्‍दोलन को कुचला जा सके।

हम आप सबसे अपील करते हैं कि फैक्‍ट्री मालिक और उसके गुण्‍डों को गिरफ्तार करने के लिए राज्‍य और ज़िला प्रशासन पर दबाव डालें और मज़दूर नेताओं को फर्जी मामलों में फंसाने से उन्‍हें रोकें। संबंधित अधिकारियों के फोन/फैक्‍स नंबरों और ईमेल आईडी की एक सूची इस मेल के साथ संलग्‍न है।

सत्‍यम
फोन : 9910462009



Commissioner                                     0551 - 2338817 (Fax)
Office of the Commissioner
Collectrate
Gorakhpur - 273001


Gorakhpur (0551)
Divisional Commissioner
2333076, 2335238 (off)
2336022 (Res)
Fax: 2338817

District Magistrate                               0551 - 2334569 (Fax)
Office of the District Magistrate
Collectrate
Gorakhpur - 273001


City Magistrate: Arun - 9450924888



Dy Inspector General of Police          0551 - 2201187 / 2333442
Cantt.
Gorakhpur:

Dy. Labour Commissioner,
Labour Office
Civil Lines
Gorakhpur-273001

DLC, ML Choudhuri - 9838123667



Governor, BL Joshi
Raj Bhavan, Lucknow, 226001
0522-2220331, 2236992, 2220494
Fax: 0522-2223892
Special Secretary to Governor: 0522-2236113







Km. Mayawati,
Chief Minister
Fifth Floor, Secretariat Annexe
Lucknow-226001
0522 - 2235733, 2239234 (Fax)
2236181  2239296
2215501 (Phone: (Pffice)
2236838 2236985
Phone: (Res)


Shri Badshah Singh :                          0522 - 2238925 (Fax)
Labour Minister, 
Department of Labour
Secretariat
Lucknow

Principal Secretary, Labour                0522 - 2237831 (Fax)
Department of Labour
Secretariat
Lucknow - 226001






District & STD Code
Post
Office
Residence
Fax
Gorakhpur (0551)
Divisional Commissioner
2333076, 2335238
2336022
2338817
Gorakhpur (0551) )
D.M.
2336005
2344544, 2336007
2334569
Gorakhpur (0551)
D.I.G.
2333442
2201100
--


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National Human rights commission 

cmup@nic.in <cmup@nic.in>           CM, UP

hgovup@up.nic.in <hgovup@up.nic.in>  Governer, UP

digrgkr@up.nic.in                     DIG, Gorakhpur

commgor@up.nic.in                 Commissioner, Gorakhpur   
laborweb@nic.in                      Labour Ministry, Central

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10.19.2009

यहाँ सत्य को झुलस रही है संविधान की आँच


एस.ए. हमजा



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इसके शब्दों में मौत की ठण्डक है
और एक-एक पृष्ठ
जिन्दगी के आखिरी पल जैसा भयानक है

पंजाब के क्रान्तिकारी कवि ''पाश'' की भारतीय संविधान पर लिखी ये पंक्तियाँ दुनिया का सबसे बड़ा व महान लोकतन्त्र अपनी राज्य मशीनरी द्वारा निर्विवाद रूप में लागू कर रहा है।
भारतीय संविधान चाहे जितने विद्ववतापूर्ण ढंग से लिखा गया हो, उसकी जमीनी हकीकत यह है कि जनता को राज्यसत्ता से अतिसीमित जनवादी अधिकार ही प्राप्त हो रहे हैं। इसके साथ व्यापक आम जनता के लिए संविधान प्रदत्त अधिकारों, कानूनी प्रावधानों और उच्चतम न्यायालय के मानवाधिकारों विषयक दिशा-निर्देशों का कोई खास मतलब नहीं है क्योंकि उनके सभी संविधान प्रदत्त अधिकार तो थाने के दीवानजी की जेब में आकर समा जाते हैं।
क्योंकि व्यवस्था के सामने चुनौती खड़ा करने या थोड़ा-सा खतरा पैदा होने पर भारतीय राज्यसत्ता का चरित्र हमेशा ही दमनकारी तथा स्वयं अपने द्वारा ही बनाए गए कायदे-कानूनों को ताक पर धर देने का होता रहा है। प्रथम आम चुनाव के पहले ही 'तेलंगाना किसान संषर्घ' का बर्बर दमन करके राज्यसत्ता ने अपने वास्तविक चरित्र को उजागर कर दिया था जिसने महान क्रान्तिकारी व विचारक भगतसिंह की इस उक्ति को सही साबित किया कि ''हमें जितनी भी सरकारों के बारे में जानकारी है, वे बल पूर्वक संचालित होती है।''
इसके बाद जनता जहाँ भी अपनी विधि सम्मत न्यायपूर्ण माँगों को लेकर सड़कों पर उतरी वहाँ उसका स्वागत लाठियों व गोलियों की बौछार से किया गया। चाहे वह आपातकाल का विरोध करने वाले लोगों का दमन हो, 1974 की रेल हड़ताल हो या फिर बेलद्दी, बेलाडीला, पन्तनगर, नारायणपुर, शेरपुर, अरवल, स्वदेशी कॉटन मिल कानपुर से लेकर मुजफ्फरनगर और बबराला काण्डों तक सत्ता प्रायोजित नरसंहारो का लम्बा सिलसिला है।
छंटनी-तालाबन्दी को लेकर सड़कों पर उतरने वाले मजदूरों पर बिजली, पानी आदि की दुर्व्‍यवस्था को लेकर आन्दोलित नागरिकों पर तथा रोजगार व सस्ती शिक्षा की माँग कर रहे युवाओं पर लाठियों गोलियों की बरसात आम बात होती है।
इसी कड़ी में एक ताजा उदाहरण है गोरखपुर का मजदूर आन्दोलन। गोरखपुर में चल रहे मजदूर आन्दोलन में उन्हीं विधि सम्मत माँगों को एजेंडे पर रखा गया है जिनको देने का भारतीय संविधान दम भरता है परन्तु सत्ता व पूँजी का गठजोड़ संवैधानिक अधिकारों को ताक पर रखकर मजदूरों व उनके नेताओं पर पुलिसिया कहर बरपाए हुए है।  विगत दो माह से चलने वाले आन्दोलन को कुचलने में पूरा जिला प्रशासन, स्थानीय सांसद व विधायक महोदय काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं तथा उसे (आन्दोलन को) चर्च द्वारा समर्थित व नक्सलवादियों द्वारा संचालित बताया जा रहा है।
पिछले 15 अक्टूबर से गिरफ्तार मजदूर नेताओं को जमानत देने से इंकार करते हुए पुलिस प्रशासन के उच्च अधिकारी उन नेताओं के साथ पुलिसिया शालीनता का परिचय देते हुए उनको बेतहाशा यातनाएँ देने में मशरूफ़ है।
पिछले 2 महीनों से गोरखपुर से लखनऊ तक हर स्तर पर मजदूरों ने अपनी बात पहुँचाई परन्तु सर्वजन हिताय की बात करने वाली सरकार कान में तेल डालकर सो रही है। मानवधिकारों की पैरवी करने वाला मानवाधिकार आयोग, तमाम एन.जी.ओ., कलम घसीट बुद्धिजीवी, असमानता-अन्याय व शोषण की बात करने वाले सामाजिक संगठन खामोश हैं (कुछ अपवादों को छोड़कर)। भारतीय लोकतन्त्र का चैथा स्तम्भ मीडिया जो ऐश्वर्या राय के छींक आने पर खबर को फ्रंट पेज पर छापता है परन्तु इस अन्यायपूर्ण आन्दोलन को छापने व प्रसारित करने की जहमत भी नहीं उठा रहा है तथा ये खबरें गोरखपुर के स्थानीय अखबारों में ही जगह पा रही है। इससे साफ पता चलता है कि सामाजिक शक्तियों की चुप्पी व मीडिया का जनान्दोलन के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया शासक वर्गों को अपनी स्थिति मजबूत करने का आधार प्रदान कर रहा है।
सन 2000 में तत्कालीन राष्ट्रपति ने गणतन्त्र दिवस के अवसर पर राष्ट्र के नाम अपने सन्देश में कहा था कि लम्बे समय से कष्ट उठा रहे लोगों का धीरज चुक रहा है। उनके गुस्से के विस्फोट से सावधान हो जाएँ। इसीलिए राज्य मशीनरी भी आने वाले जनसंघर्षों से निपटने के लिए व्यापक तैयारी कर रही है। आखिर क्या कारण है कि पिछले एक दशक में यू.पी. पुलिस में ही सबसे ज्यादा भर्तियाँ हुई, अन्य विभागों में क्यों नहीं। अगर तर्क दिया जाए कि अपराधों को रोकने के लिए तो पिछले 10 वर्ष के आंकड़े राज्य में क्राइम की बढ़ोत्तरी का संकेत करते हैं न कि कम होने का।
गोरखपुर आन्दोलन भी उन्हीं जनसंघर्षों की सुगबुगाहट का सन्देश है और गोरखपुर जिला प्रशासन उस पर नक्सलवाद का ठप्पा लगाकर बदनाम करने की कोशिशों में लगा हुआ है क्योंकि आन्दोलन पर एक बार यदि माओवाद की मुहर लग गई तो बाकी सारी चीजों के सन्दर्भ व अर्थ अपने आप बदल जायेंगे। आन्दोलन को माओवादी आन्दोलन साबित करके या उसके नेताओं को माओवादी साबित करने के पीछे एक दृष्टिकोण यह भी है कि बाहरी समुदाय व आन्दोलन के बीच अलगाव की एक मानसिक खाई बन जाए तथा लोग उसे नैतिक समर्थन न दे।