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5.12.2011

मीडिया के अपने मित्रों का आभार और चंद बातें

मीडिया के अपने मित्रों का आभार और चंद बातें


प्रिय मित्रो,

पिछले 3 मई को गोरखपुर में अंकुर उद्योग के मालिक द्वारा मजदूरों पर गोलियां चलवाने और उसके बाद से मजदूर आंदोलन के दमन के सिलसिले में आपसे ख़तो-किताबत तथा बातचीत होती रही है। हमारी ओर से भेजी गई ईमेल आदि तथा अपने स्रोतों से आपको मालूम ही होगा कि मज़दूरों की एकता तथा देशभर में हुई निंदा और चौतरफा दबाव के बाद 9 तारीख़ की रात को गोरखपुर का प्रशासन व अंकुर उद्योग का मालिक झुकने को मजबूर हो गए। फिलहाल अंकुर उद्योग के मालिक ने कुछ मांगें मानी हैं और 18 मजदूरों को काम पर वापस रखा है तथा फैक्‍ट्री चालू हो गई है।

हालांकि अब भी वी.एन. डायर्स के दो कारखानों में तालाबंदी जारी है, सत्तर-अस्‍सी गुण्‍डों को लेकर मजदूरों पर गोलियां चलाने वाला प्रदीप सिंह अभी तक पकड़ा नहीं गया और ना ही मजदूरों पर से फर्जी मुकदमे वापस लिए गए हैं,न घायल मज़दूरों को मुआवज़ा घोषित हुआ है, न इस बर्बर गोलीकांड के लिए मालिक पर कोई कार्रवाई हुई है और न ही न्‍यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं। फिर भी, दमन-उत्‍पीड़न से मज़दूरों को राहत मिली है और मालिकान तथा प्रशासन पीछे हटने पर बाध्‍य हुए हैं, आगे के लिए बातचीत करने पर भी राजी होना पड़ा है।
निश्चित ही, इसके लिए मुख्‍य रूप से बधाई के पात्र गोरखपुर के मजदूर ही हैं जिन्‍होंने दमन का डटकर मुकाबला किया; लेकिन देशभर में हुई निंदा तथा जनदबाव का और मीडिया के आप सभी साथियों के सहयोग और समर्थन का इसमें बहुत बड़ा योगदान है। इसके लिए मैं 'गोरखपुर मजदूर आंदोलन समर्थक नागरिक मोर्चा' की ओर से मीडिया के सभी साथियों का आभार प्रकट करना चाहता हूं (दो वर्ष पहले गोरखपुर के मज़दूर आंदोलन के दमन के समय गठित इस मोर्चे में मैं शामिल रहा हूं)।
मैं लंबे समय तक देश के कई प्रतिष्ठित हिंदी अखबारों से जुड़ा रहा हूं और पिछले तीन साल से स्‍वतंत्र रूप से पत्रकारिता कर रहा हूं। मुझे इस बात का अहसास है कि तमाम ''दबावों'' के बावजूद मीडिया के साथियों ने जिस तरह इस पूरे मामले को अपने पत्र-पत्रिका/चैनल में स्‍थान दिया, वह काफी चुनौतीपूर्ण रहा होगा। चौतरफा निंदा और मीडिया की खबरों से गोरखपुर के मालिकान-प्रशासन पर जो दबाव बना है उसमें आप सभी का योगदान सराहनीय है।
लेकिन, मैं एक बात की ओर ध्‍यान दिलाना चाहूंगा। दो साल पहले भी गोरखपुर में मजदूरों का आंदोलन चला था। उस समय भी जनदबाव और मीडियाकर्मियों के सहयोग के कारण मालिकान-प्रशासन-राजनेता गठजोड़ को झुकना पड़ा था। लेकिन उस समय तीन-चार बार किए गए समझौते आज तक लागू नहीं हुए। अगुआ मजदूरों को चुन-चुन कर प्रताड़ि‍त किया गया तथा समय बीतने के साथ झूठे आरोप लगाकर एक-एक करके उन्‍हें निकाल बाहर किया। और इस बार भी मालिक-प्रशासन ऐसा ही कर सकते हैं। हालत यह है कि चुपचाप सबकुछ सहकर काम करो, तो आप शांत, आज्ञाकारी, मेहनती, विकास को बढ़ावा देने वाले आदि-आदि हैं, वरना आप उकसावेबाज, माओवादी, नक्‍सलवादी करार दिए जाएंगे (वैसे हम मीडियाकर्मियों की स्थिति भी बहुत अच्‍छी नहीं है, और इस बात को आपसे बेहतर कौन जानता होगा?)। उस समय भाजपा के स्‍थानीय सांसद आदित्‍यनाथ ने लगातार मजदूरों और उनके नेताओं के खिलाफ जहर उगला था और पहले तो इसे सांप्रदायिक रंग देने का प्रयास किया तथा मजदूरों को कामचोर तक कहा। बाद में, थू-थू होने पर उन्‍होंने मजदूरों के नेताओं को निशाना बनाया और अखबारों में बयान जारी करके उन पर नक्‍सलवादी-माओवादी-बाहरी तत्‍व आदि का लेबल चस्‍पां करने लगे। प्रशासन भी मालिकों के सुर में सुर मिलाता रहा। (अभी मोहल्‍ला लाइव पर इस आंदोलन की खबर पर गौरव सोलंकी ने टिप्‍पणी की है कि ''मुझे एक बात याद आई। तहलका में जब मैंने गोरखपुर के मजदूरों की स्टोरी की थी पिछले साल, तब वहाँ के डिप्टी लेबर कमिश्नर को फ़ोन किया था उनकी राय जानने के लिए। उन्होंने कहा कि आपको जो करना है, कर लो। जहाँ श्रम विभाग के अधिकारी ही डॉन के लहजे में बात करते हैं, वहाँ स्थितियाँ कितनी भयावह हो सकती हैं, आप सोचिए।'') मज़दूर नेताओं को बातचीत के बहाने बुलाने के बाद मारा-पीटा गया और फर्जी मुकदमे तक दायर कर दिए। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उनका एनकाउंटर तक करने की कोशिश की गई। लेकिन उस समय भी जनदबाव और मीडिया में मौजूद साथियों की तत्‍परता के कारण वे इस घृणित कार्य को अंजाम नहीं दे सके।

मजदूरों के जुझारू संघर्ष और देशव्‍यापी जनदबाव से गोरखपुर में मजदूर आंदोलन को मिली आंशिक जीत

पुलिस-प्रशासन के भारी दमन के बावजूद गोरखपुर के मजदूरों के जुझारू संघर्ष और एक सप्ताह से जारी दमन-उत्पीड़न की देशव्यापी निंदा तथा व्यापक जनदबाव ने प्रशासन और मालिकान को कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया और वहां मजदूर आंदोलन को आंशिक जीत हासिल हुई है।

कल ‘मजदूर सत्याग्रह’ के लिए शांतिपूर्ण ढंग से आयुक्त कार्यालय पर जा रहे मजदूरों पर शहर में जगह-जगह हुए लाठीचार्ज, गिरफ्तारी, सार्वजनिक वाहनों तक से उतारकर मजदूरों की पिटाई और महिला मजदूरों के साथ पुलिस के दुर्व्‍यवहार की चौतरफा भर्त्सना और सैकड़ों मजदूरों के टाउनहाल पर भूख हड़ताल शुरू कर देने के बाद प्रशासन भारी दबाव में आ गया था। अधिकारियों ने देर शाम हिरासत में लिये गये सभी मजदूर नेताओं और मजदूरों को रिहा कर दिया तथा मालिकों को वार्ता के लिए बुलाया था। कुछ मांगों पर मालिक की सहमति तथा आज औपचारिक वार्ता तय होने के बाद कल रात अधिकांश मजदूरों ने भूख हड़ताल स्थगित कर धरना हटा लिया था लेकिन करीब 25 मजदूरों की भूख हड़ताल जारी थी।
आज उपश्रमायुक्त की मौजूदगी में मालिकों तथा मजदूरों के प्रतिनिधियों के बीच हुई वार्ता के बाद अंकुर उद्योग से निकाले गये सभी 18 मजदूरों को काम पर वापस लेने तथा कारखाना कल से शुरू करने पर मालिक पक्ष सहमत हो गया। हालांकि वीएन डायर्स के दो कारखानों से निकाले गये 18 मजदूरों को बहाल करने के सवाल पर अब भी गतिरोध बना हुआ है।

आंदोलन का संचालन कर रहे संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा के अनुसार गोलीकांड के मुख्य अभियुक्तों की गिरफ्तारी तथा अभियुक्तों को बचाने वाले अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई, घायल मजदूरों को सरकार से मुआवजा दिलाने, मजदूरों पर थोपे गये सभी फर्जी मुकदमे हटाने तथा गोलीकांड और 9 मई को ‘मजदूर सत्याग्रह’ पर हुए बर्बर दमन की न्यायिक जांच की मांग को लेकर आंदोलन जारी रहेगा। अगर ये मांगें नहीं मानी गयीं तो जल्दी ही ‘मजदूर सत्याग्रह’ का दूसरा चरण शुरू किया जाएगा, जो पहले से भी अधिक व्यापक होगा।

कल ‘मजदूर सत्याग्रह’ के बर्बर दमन की देश-विदेश में कठोर भर्त्सना हुई है। देश भर से न्यायविदों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मजदूर आंदोलन से जुड़े लोगों ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री, राज्यपाल, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों तथा केंद्र सरकार को सैकड़ों की संख्या में फैक्स, ईमेल, फोन तथा ज्ञापन भेजकर अपना विरोध दर्ज कराया है तथा दमन चक्र तत्काल रोकने, घटना की तुरंत न्यायिक जांच कराने, मजदूरों की जायज मांगे मानने और दोषियों की खिलाफ त्वरित कार्रवाई करने की मांग की है। पीयूसीएल एवं पीयूडीआर की ओर से जांच टीमें गोरखपुर भेजने की घोषणा की गयी है और वरिष्ठ पत्रकारों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं की कुछ स्वतंत्र जांच टीमें भी जल्दी ही तथ्यसंग्रह के लिए गोरखपुर जाएंगी।

सरकारी दमन तथा मालिक-प्रशासन-सांप्रदायिक ताकतों के गंठजोड़ द्वारा जारी अंधेरगर्दी के विरुद्ध भारी जन आक्रोश और व्यापक जनदबाव के कारण यह छोटी-सी जीत मिली है लेकिन गोरखपुर के मजदूरों के सामने अभी बहुत कठिन लड़ाई है और देशभर के इंसाफपसंद नागरिकों तथा किसी भी मोर्चे पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को उनका साथ देना होगा। दमन-उत्पीड़न के तात्कालिक मसले पर मजदूरों को थोड़ी राहत मिली है लेकिन जिन बुनियादी मांगों को लेकर गोरखपुर में मजदूरों ने आवाज उठायी थी, वे आज भी यथावत हैं। वहां के किसी भी कारखाने में कोई भी श्रम कानून लागू नहीं होता। न्यूनतम मजदूरी, काम के घंटे, जबरन ओवरटाइम, जॉब कार्ड, ईएसआई जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी मजदूर वंचित हैं। श्रम विभाग सब कुछ जानते हुए भी कुछ नहीं करता। जब तक इन मांगों पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक बीच-बीच में मजदूर असंतोष का ज्वार फूटता ही रहेगा।

संयुक्त मजदूर अधिकार संघर्ष मोर्चा ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर मालिकों ने फिर से पहले की तरह वायदाखिलाफी और छलकपट से मजदूरों को उनके अधिकार से वंचित करने की कोशिश की या अगुआ मजदूरों को किसी भी तरह से प्रताड़ित करने की कोशिश की तो इसके नतीजे भुगतने के लिए उन्हें तैयार रहना होगा।

मोर्चा ने मजदूर आंदोलन का भरपूर साथ देने तथा प्रशासन पर दबाव बनाने में मदद करने वाले न्यायविदों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं को धन्यवाद देते हुए गोरखपुर के मजदूरों को न्याय दिलाने के संघर्ष में सभी से आगे भी सहयोग की अपील की है।

कृते,
गोरखपुर मजदूर आंदोलन समर्थक नागरिक मोर्चा
9936650658 (कात्यायनी)
9910462009 (सत्यम, satyamvarma@gmail.com)
8447011935 (संदीप, sandeep.samwad@gmail.com)

5.11.2011

मजदूरों पर हमले के खिलाफ आमरण अनशन का एलान

81 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता कमला पांडेय ने मायावती को लिखी चिट्ठी

प्रति,
सुश्री मायावती जी,
मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश


विषय : गोरखपुर के मजदूरों के बर्बर दमन की अविलंब निष्पक्ष जांच की मांग तथा ऐसा न होने की स्थिति में आमरण अनशन की पूर्व सूचना



प्रिय मायावती जी,

मैं,कमला पांडेय, आयु 81 वर्ष, साठ वर्षों से गरीबों-मजलूमों के लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ती रही हूं और उप्र माध्यमिक शिक्षक संघ की स्‍थापना के समय से ही उसमें सक्रिय रही हूं। अब जीवन की सांध्य बेला में, हृदय रोग और शारीरिक अशक्तता के बावजूद अपनी सामाजिक सक्रियता जारी रखते हुए मैं बच्चों की संस्था ‘अनुराग ट्रस्ट’ चलाती हूं।

महोदया, गोरखपुर के मजदूरों पर पिछले दो हफ्तों से पुलिस-प्रशासन और उद्योगपतियों के गुंडों का जो बर्बर आतंकराज जारी है, उसकी खबरें मुझे विचलित करती रही हैं। फर्जी मुकदमे, गिरफ्तारी, लाठीचार्ज आदि की कार्रवाई तो अप्रैल से ही जारी है। 3 मई को ‘अंकुर उद्योग’ के मालिकों के गुंडों द्वारा अंधाधुंध गोलीवर्षा में 19 मजदूर जख्मी हुए, जिनमें से एक अभी भी जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहा है। आपके पुलिस प्रशासन ने गिरफ्तारी का बहाना बनाकर गुंडों को फैक्ट्री परिसर से बाहर निकालने का और मजदूर नेताओं पर नये फर्जी मुकदमे ठोंकने का काम किया। गोरखपुर के कमिश्नर वहां के भाजपा सांसद के सुर में सुर मिलाते हुए मजदूर नेताओं को ”बाहरी तत्व” और ”उग्रवादी” तक की संज्ञा दे रहे हैं। इन कर्मठ युवा नेताओं को मैं जानती हूं। ये मजदूर हितों के लिए संघर्षरत न्यायनिष्ठ लोग हैं।

महोदया, आज 9 मई को हजारों मजदूर दो फैक्ट्रियों की अवैध तालाबंदी समाप्त करने, मजदूरों से फर्जी मुकदमे हटाने और मजदूरों पर गोली चलाने की घटना की निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग को लेकर जब कमिश्नर कार्यालय की ओर शांतिपूर्ण ‘मजदूर सत्याग्रह’ शुरू करने जा रहे थे, तो उन पर बर्बर लाठीचार्ज और पानी की बौछार की गयी। शहर में कहीं भी उन्हें इकट्ठा होने से रोकने के लिए पुलिस ने आतंक राज कायम कर दिया। कई नेताओं, मजदूरों को हिरासत में ले लिया गया। इसके बावजूद, शाम 4 बजे मुझे सूचना मिलने तक कई सौ मजदूर टाउन हॉल, गांधी प्रतिमा के पास पहुंचकर अनशन की शुरुआत कर चुके थे।

मायावती जी, मजदूरों पर दमन का यह सिलसिला तो वास्तव में पिछले दो वर्षों से जारी है, जबसे वे कम से कम कुछ श्रम कानूनों को लागू करने की मांग कर रहे हैं।
आप स्वयं पता कीजिए कि गोरखपुर के कारखानों में क्या कोई भी श्रम कानून लागू होता है? यदि इनकी मांग उठाने वाले ”उग्रवादी” हैं तो मैं भी स्वयं को गर्व से ”उग्रवादी” कहना चाहूंगी। इस बार दमन और अत्याचार तो सारी सीमाओं को लांघ गया है। सत्ता में बैठे लोगों को यदि जनता निरीह भेड़-बकरी दीखने लगती है और इंसाफ की आवाज उनके कानों तक पहुंचती ही नहीं, तो इतिहास उन्हें कड़ा सबक सिखाता है।

मायावती जी, मैं विनम्रतापूर्वक आपको सूचित करना चाहती हूं कि यदि गोरखपुर के मजदूरों पर बर्बर अत्याचार बंद नहीं किया जाएगा, यदि मजदूरों पर गुंडों द्वारा गोली वर्षा के मामले की निष्पक्ष जांच नहीं होगी, यदि अवैध तालाबंदी खत्म करने के लिए प्रशासन मालिकों को बाध्य नहीं करेगा और यदि मजदूरों की

न्यायसंगत मांगों पर विचार नहीं किया जाएगा, तो मैं स्वयं व्हीलचेयर पर बैठकर मजदूर सत्याग्रह में हिस्सा लेने जाऊंगी। किसी लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण प्रतिरोध के लिए शासन से इजाजत लेना मैं जरूरी नहीं समझती। यदि न्याय की आवाज की अनसुनी की जाती रहेगी, तो आमरण अनशन करके प्राण त्यागना मेरे लिए गौरव की बात होगी। मुझे विश्वास है कि मेरे इस बलिदान से मजदूरों के संघर्ष को शक्ति मिलेगी और लोकतांत्रिक अधिकारों के संघर्ष में उतरने के लिए तथा न्याय की लड़ाई में शोषितों-दलितों का साथ देने के लिए बुद्धिजीवी समुदाय के अंतर्विवेक को भी झकझोरा जा सकेगा।


मायावती जी, मैं आपको धमकी या चेतावनी नहीं दे रही हूं। सत्ता की प्रचंड शक्ति के आगे मुझे जैसे किसी नागरिक की भला क्या बिसात? मैं आपसे अनुरोध कर रही हूं कि आप अपने स्तर से मामले की जांच कराकर न्याय कीजिए और सत्ता मद में चूर अपने निरंकुश अफसरों की नकेल कसिए। मैं इस न्याय संघर्ष में भागीदारी के अपने संकल्प की आपको सूचना दे रही हूं और विनम्रतापूर्वक बस यह याद दिलाना चाहती हूं कि लाठियों-बंदूकों से सच्चाई और इंसाफ की आवाज कुछ देर को चुप करायी जा सकती है, लेकिन हमेशा के लिए कुचली नहीं जा सकती।

साभिवादन,

भवदीया,
कमला पांडेय

दिनांक : 9/10/2011
संपर्क : डी 68, निरालानगर, लखनऊ 226020

गोरखपुर मजदूर गोलीकांड के विरोध में तैयार की गयी ऑनलाइन पिटिशन। कृपया आप भी हस्‍ताक्षर करें...


10.19.2009

यहाँ सत्य को झुलस रही है संविधान की आँच


एस.ए. हमजा



यह पुस्तक मर चुकी है
इसे न पढ़ें
इसके शब्दों में मौत की ठण्डक है
और एक-एक पृष्ठ
जिन्दगी के आखिरी पल जैसा भयानक है

पंजाब के क्रान्तिकारी कवि ''पाश'' की भारतीय संविधान पर लिखी ये पंक्तियाँ दुनिया का सबसे बड़ा व महान लोकतन्त्र अपनी राज्य मशीनरी द्वारा निर्विवाद रूप में लागू कर रहा है।
भारतीय संविधान चाहे जितने विद्ववतापूर्ण ढंग से लिखा गया हो, उसकी जमीनी हकीकत यह है कि जनता को राज्यसत्ता से अतिसीमित जनवादी अधिकार ही प्राप्त हो रहे हैं। इसके साथ व्यापक आम जनता के लिए संविधान प्रदत्त अधिकारों, कानूनी प्रावधानों और उच्चतम न्यायालय के मानवाधिकारों विषयक दिशा-निर्देशों का कोई खास मतलब नहीं है क्योंकि उनके सभी संविधान प्रदत्त अधिकार तो थाने के दीवानजी की जेब में आकर समा जाते हैं।
क्योंकि व्यवस्था के सामने चुनौती खड़ा करने या थोड़ा-सा खतरा पैदा होने पर भारतीय राज्यसत्ता का चरित्र हमेशा ही दमनकारी तथा स्वयं अपने द्वारा ही बनाए गए कायदे-कानूनों को ताक पर धर देने का होता रहा है। प्रथम आम चुनाव के पहले ही 'तेलंगाना किसान संषर्घ' का बर्बर दमन करके राज्यसत्ता ने अपने वास्तविक चरित्र को उजागर कर दिया था जिसने महान क्रान्तिकारी व विचारक भगतसिंह की इस उक्ति को सही साबित किया कि ''हमें जितनी भी सरकारों के बारे में जानकारी है, वे बल पूर्वक संचालित होती है।''
इसके बाद जनता जहाँ भी अपनी विधि सम्मत न्यायपूर्ण माँगों को लेकर सड़कों पर उतरी वहाँ उसका स्वागत लाठियों व गोलियों की बौछार से किया गया। चाहे वह आपातकाल का विरोध करने वाले लोगों का दमन हो, 1974 की रेल हड़ताल हो या फिर बेलद्दी, बेलाडीला, पन्तनगर, नारायणपुर, शेरपुर, अरवल, स्वदेशी कॉटन मिल कानपुर से लेकर मुजफ्फरनगर और बबराला काण्डों तक सत्ता प्रायोजित नरसंहारो का लम्बा सिलसिला है।
छंटनी-तालाबन्दी को लेकर सड़कों पर उतरने वाले मजदूरों पर बिजली, पानी आदि की दुर्व्‍यवस्था को लेकर आन्दोलित नागरिकों पर तथा रोजगार व सस्ती शिक्षा की माँग कर रहे युवाओं पर लाठियों गोलियों की बरसात आम बात होती है।
इसी कड़ी में एक ताजा उदाहरण है गोरखपुर का मजदूर आन्दोलन। गोरखपुर में चल रहे मजदूर आन्दोलन में उन्हीं विधि सम्मत माँगों को एजेंडे पर रखा गया है जिनको देने का भारतीय संविधान दम भरता है परन्तु सत्ता व पूँजी का गठजोड़ संवैधानिक अधिकारों को ताक पर रखकर मजदूरों व उनके नेताओं पर पुलिसिया कहर बरपाए हुए है।  विगत दो माह से चलने वाले आन्दोलन को कुचलने में पूरा जिला प्रशासन, स्थानीय सांसद व विधायक महोदय काफी दिलचस्पी दिखा रहे हैं तथा उसे (आन्दोलन को) चर्च द्वारा समर्थित व नक्सलवादियों द्वारा संचालित बताया जा रहा है।
पिछले 15 अक्टूबर से गिरफ्तार मजदूर नेताओं को जमानत देने से इंकार करते हुए पुलिस प्रशासन के उच्च अधिकारी उन नेताओं के साथ पुलिसिया शालीनता का परिचय देते हुए उनको बेतहाशा यातनाएँ देने में मशरूफ़ है।
पिछले 2 महीनों से गोरखपुर से लखनऊ तक हर स्तर पर मजदूरों ने अपनी बात पहुँचाई परन्तु सर्वजन हिताय की बात करने वाली सरकार कान में तेल डालकर सो रही है। मानवधिकारों की पैरवी करने वाला मानवाधिकार आयोग, तमाम एन.जी.ओ., कलम घसीट बुद्धिजीवी, असमानता-अन्याय व शोषण की बात करने वाले सामाजिक संगठन खामोश हैं (कुछ अपवादों को छोड़कर)। भारतीय लोकतन्त्र का चैथा स्तम्भ मीडिया जो ऐश्वर्या राय के छींक आने पर खबर को फ्रंट पेज पर छापता है परन्तु इस अन्यायपूर्ण आन्दोलन को छापने व प्रसारित करने की जहमत भी नहीं उठा रहा है तथा ये खबरें गोरखपुर के स्थानीय अखबारों में ही जगह पा रही है। इससे साफ पता चलता है कि सामाजिक शक्तियों की चुप्पी व मीडिया का जनान्दोलन के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया शासक वर्गों को अपनी स्थिति मजबूत करने का आधार प्रदान कर रहा है।
सन 2000 में तत्कालीन राष्ट्रपति ने गणतन्त्र दिवस के अवसर पर राष्ट्र के नाम अपने सन्देश में कहा था कि लम्बे समय से कष्ट उठा रहे लोगों का धीरज चुक रहा है। उनके गुस्से के विस्फोट से सावधान हो जाएँ। इसीलिए राज्य मशीनरी भी आने वाले जनसंघर्षों से निपटने के लिए व्यापक तैयारी कर रही है। आखिर क्या कारण है कि पिछले एक दशक में यू.पी. पुलिस में ही सबसे ज्यादा भर्तियाँ हुई, अन्य विभागों में क्यों नहीं। अगर तर्क दिया जाए कि अपराधों को रोकने के लिए तो पिछले 10 वर्ष के आंकड़े राज्य में क्राइम की बढ़ोत्तरी का संकेत करते हैं न कि कम होने का।
गोरखपुर आन्दोलन भी उन्हीं जनसंघर्षों की सुगबुगाहट का सन्देश है और गोरखपुर जिला प्रशासन उस पर नक्सलवाद का ठप्पा लगाकर बदनाम करने की कोशिशों में लगा हुआ है क्योंकि आन्दोलन पर एक बार यदि माओवाद की मुहर लग गई तो बाकी सारी चीजों के सन्दर्भ व अर्थ अपने आप बदल जायेंगे। आन्दोलन को माओवादी आन्दोलन साबित करके या उसके नेताओं को माओवादी साबित करने के पीछे एक दृष्टिकोण यह भी है कि बाहरी समुदाय व आन्दोलन के बीच अलगाव की एक मानसिक खाई बन जाए तथा लोग उसे नैतिक समर्थन न दे।