एक साल बहुत होते हैं, करीम को रिहा करो

>> 11.09.2007


मिस्‍त्र की सरकार और भारत में उसके प्रतिनिधियों के नाम...
युवा ब्‍लॉगर करीम को रिहा करो। अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर हमले बंद करो।




द्वारा,

संदीप, रेयाज़, कुमार मुकुल, मिहिरभोज, किताब

1 comments:

Pratik 11/11/2007  

सत्ता हमेशा ही क्रांतिकारियों का दमन करती है। इस तरह का अमानवीय दमन उसके भय को ही दिखलाता है। वैसे भी सत्ता और संगठित मज़हब का चोली-दामन का साथ है। उम्मीद है कि भारत के सभी विचारशील लोग आपके स्वर में स्वर मिलाकर करीम की रिहाई की मांग करेंगे। मेरा ब्लॉग तकनीकी कारणों से नहीं चल पा रहा है, अन्यथा मैं भी इस विषय पर एक पोस्ट लिखने की कोशिश करता।

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संदीप
'' प्रत्‍येक कलाकार, प्रत्‍येक वैज्ञानिक, प्रत्‍येक लेखक को अब यह तय करना होगा कि वह कहां खड़ा है। संघर्ष से ऊपर, ओलंपियन ऊंचाईयों पर खड़ा होने की कोई जगह नहीं होती। कोई तटस्‍थ प्रेक्षक नहीं होता...युद्ध का मोर्चा हर जगह है। सुरक्षित आश्रय के रूप में कोई पृष्‍ठभाग नहीं है...कलाकार को पक्ष चुनना ही होगा। स्‍वतंत्रता के लिए संघर्ष या फिर गुलामी- उसे किसी एक को चुनना ही होगा। मैंने अपना चुनाव कर लिया है। मेरे पास और कोई विकल्‍प नहीं है।'' पॉल रोबसन, 24 जुलाई, 1937 (स्‍पेन में फासिस्‍ट ताकतों के विरुद्ध जारी संघर्ष के दौरान आह्वान)
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