6.28.2016

वीरेन डंगवाल को फिर से पढ़ते हएु

वीरेन डंगवाल की कविताएं बहुत दिनों बाद दोबारा पढ़ रहा हूं, सोचा एक-आध कविता आपके साथ भी साझा की जाए।

इतने भले नहीं बन जाना 


इतने भले नहीं बन जाना साथी
जितने भले हुआ करते हैं सरकस के हाथी
गदहा बनने में लगा दी अपनी सारी कुव्वत सारी प्रतिभा
किसी से कुछ लिया नहीं न किसी को कुछ दिया
ऐसा भी जिया जीवन तो क्या जिया?


इतने दुर्गम मत बन जाना
सम्भव ही रह जाय न तुम तक कोई राह बनाना
अपने ऊंचे सन्नाटे में सर धुनते रह गए
लेकिन किंचित भी जीवन का मर्म नहीं जाना


इतने चालू मत हो जाना
सुन-सुन कर हरक़ते तुम्हारी पड़े हमें शरमाना
बग़ल दबी हो बोतल मुँह में जनता का अफसाना
ऐसे घाघ नहीं हो जाना


ऐसे कठमुल्ले मत बनना
बात नहीं हो मन की तो बस तन जाना
दुनिया देख चुके हो यारो
एक नज़र थोड़ा-सा अपने जीवन पर भी मारो
पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव
कठमुल्लापन छोड़ो
उस पर भी तो तनिक विचारो


काफ़ी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमण्ड के नभ की फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी

6.23.2016

नकाब

-- संदीप संवाद --

Emil Nolde--Masks, 1911 
तुम्‍हें जितने नकाब ओढ़ने हैं, ओढ़ लो;

लेकिन ये उम्‍मीद ना पालो

कि मैं तुम्‍हारी तरह नकाब पहनूंगा

मैं जैसा हूं, वैसे ही अच्‍छा हूं।

और वैसे भी बहुत दिन तक

तुम इन नकाबों के पीछे

      अपनी कुटिलताओं को छिपा नहीं पाओगे

            जल्‍दी ही नोच लिए जाएंगे,

                सारे नकाब तुम्‍हारे चेहरे से ।

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क्‍यों घबराते हो साथी? कोई व्‍यवस्‍था बलशाली है, तो तुम भी युवा हो; अनुभव का क्‍या है, वह तो हासिल हाे ही जाएगा!




संदीप संवाद



कुछ दिन पहले एम.एल. के एक संगठन के ऑर्गेनाइजर से बात हुई। वह मोहभंग की स्थिति में था। उससे बात करने के बाद जो चीजें सामने आई, उसने एक बार कुछ चीजों पर सोचने पर मजबूर कर दिया। और फिर लगा कि सामान्‍यीकृत ढंग से तो फेसबुक जैसे मंच पर भी इन चीजों को साझा किया जा सकता है। इसे किसी एक संगठन की स्थिति ना समझा जाए, बल्कि मौजूदा दौर में पूरे माले आंदोलन में आपको ये लक्षण मिल जाएंगे। वैसे, पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी और फासीवाद के हो-हल्‍ले के बीच; आपको क्रांतिकारी पार्टी के निर्माण की समस्‍याओं पर विचार करना हो, तो बोल्‍शेविक पार्टी का इतिहास, व नादेज़्दा क्रूपस्‍काया द्वारा लिखी लेनिन की जीवनी पढ़ लीजिए। शायद कुछ मदद मिले। क्‍योंकि इस दौर में ये दो किताबें आपको गहन अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकती हैं। 

हालांकि, मुझे विद्वान होने का कोई भ्रम नहीं है, ना ही मैं किसी विषय का विशेषज्ञ हूं, लेकिन कुछ अनुभव और सीमित अध्‍ययन के बल पर ही सही, मुझे अपने विचार साझा करने का पूरा हक है। इस से किसी विद्वान को आपत्ति हो, तो हुआ करे। वैसे, हो सकता है कि क्रांति को अपनी बपौती समझने वालों को इन सब बातों से परेशानी हो, और कुत्‍सा-प्रचार का एक दौर फिर शुरू हो जाए, लेकिन जो भी हो, मैं तो एक बार फिर यही कहूंगा कि समाज में ही नहीं, बल्कि संगठनों के भीतर चल रही तानाशाही, यथास्थितिवाद से भी निराश होने की जगह इनसे जुझने की तैयारी की जाए। क्‍योंकि बाहरी लड़ाई के बराबर ही अंदरूनी लड़ाई भी जरूरी होती है। और ऐसा ना होता तो दो लाइनों के संघर्ष की बात ही कभी ना उठी होती। 

और एक बात, अगर किसी भी नौजवान में अकेले पड़ जाने, गालियां खाने, दुष्‍प्रचार और अपने खिलाफ जोड़-तोड़ सहने का साहस नहीं तो उसे क्रांति के रास्‍ते पर नहीं आना चाहिए, ये इतना आसान रास्‍ता नहीं है दोस्‍त! इतना आसान होता तो दुनिया बहुत पहले ही खूबसूरत बन चुकी होती और तुम निराशा, अवसाद, पतन के गर्त में गिरने के बजाय उस दुनिया की खूबसूरती के गीत लिख रहे होते। खूबसूरत दुनिया की खूबसूरती के गीत...लेकिन अभी तो सन्‍नाटे को चीरने वाले गीतों की जरूरत है। अभी, शब्‍दों को हथियार बनाने की जरूरत है और अभी अपने शब्‍दों को, गीतों को, आवाज को - ऐसे तूफान में तब्‍दील करने की जरूरत है, जिससे दुश्‍मन बौखला उठा, उसका सारा घाघपन, अनुभव, ताकत थरथरा उठे और उसकी जड़ता का खोखलापन भरभरा कर गिर जाए। यही समय है कि हर उस चीज के खिलाफ बगावत कर दी जाए, जो आपके सपनों को कुचलती है, और आपके भीतर के बचे हुए इंसान का रोज़-ब-रोज़ क़त्‍ल करती है।

खैर, अब मुद्दे पर आते हैं, बात यह हो रही थी कि कोई भी क्रांतिकारी संगठन इसी समाज से आए अगुवा तत्‍वों से बनता है। लेकिन वे तत्‍व इस समाज की बुर्जुआ मूल्‍य मान्‍यताएं भी अपने साथ लाते हैं और रोज-रोज समाज के साथ अंतर्क्रिया के दौरान समाज को प्रभावित करने पर भी, खुद बुर्जुआ विचारों से प्रभावित भी होते हैं। राजनीतिक कैरियरवाद, अवसरवाद, समूहवाद, पिछलग्‍गूपना, नौकरशाही, जोड़-तोड़, परिवारवाद ये सब तो इसके लक्षणमात्र है। दरअसल, पहले व्‍यवहार में नजर आने वाली ये समस्‍याएं शुरुआत में केवल राजनीतिक-सांगठनिक समस्‍याएं दिखती हैं, लेकिन धीरे-धीरे ये विचारधारात्‍मक धरातल पर भी दिखाई देने लगती है।

क्रांतिकारी चौकसी ही उन्‍हें पतन से बचा से सकती है! और यह चौकसी समांतर धरातल पर तो काम करती ही है बल्कि नीचे से ऊपर की ओर संगठित करने पर यह नेतृत्‍व को भी पतित होने से बचाती है, जोकि सबसे पहले पतित होता है। यदि नीचे से ऊपर की ओर चौकसी की व्‍यवस्‍था ना हो तो कालांतर में वह संगठन पतन की ओर अग्रसर होता है और कतारें निराशा, अवसाद, भोगवाद और फिर पतन की शिकार होती हैं। अगर संगठन अवसरवादी ढंग से काम करता है तो कतारों के भी बड़े हिस्‍से को इसका अंदाजा नहीं होता, क्‍योंकि नेतृत्‍व आखिर नेतृत्‍व होता है और हर काम में, अनुभव में भी कतारों से काफी आगे होता है। वह विरोध करने वाले तत्‍वों के खिलाफ माहौल बनाता है, नैतिक आचरण पर कीचड़ उछालता है और उन्‍हें एक दूसरे के खिलाफ भड़काता है, और जोड़तोड़ करता है। ऐसे में नीचे से ऊपर की ओर क्रांतिकारी चौकसी और भी जरूरी हो जाती है, और कतारों की राजनीतिक समझदारी, पहलकदमी इसकी पूर्वशर्त होती है। 

इसलिए, ध्‍यान रखिए, यदि कोई संगठन कतारों की पहलकदमी पर अंकुश लगा रहा है और दो लाइनें के संघर्ष या जनवादी केंद्रीयता के नाम पर नौकरशाहाना व्‍यवहार कर रहा है, केवल केंद्रीयता पर जोर दे रहा है तो कालांतर में उसका पतन निश्चित है। 

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कुछ लक्षण दिखने मात्र से ही किसी संगठन को पतित घोषित कर दिया जाए। आदर्शीकरण किसी भी चीज का बु‍रा होता है, चाहे क्रांति का हो, चाहे नेतृत्‍व का। यदि आप अपने प्रति नरमी की उम्‍मीद करते हैं, तो नेतृत्‍व के प्रति भी तब तक वैसा व्‍यवहार कीजिए, उनकी मानवीय कमजोरियों को समझिये जब‍तक की आपको यकीन ना हो जाए कि अब नेतृत्‍व का कुछ नहीं हो सकता। हालांकि, किसी संगठन, पार्टी के नेतृत्‍व में आस्‍था बनाए रखते हुए, यह सब इतना आसान नहीं होता, लेकिन असंभव भी नहीं होता। बस आपको उन तमाम खतरों से सचेतन तौर पर बचना होता है, जो कोई भी व्‍यवस्‍था, चीजों को बदलने के लिए काम करने वालों के खिलाफ संदेह पैदा करने के मकसद से उत्‍पन्‍न करती है। 

अभी देर नहीं हुई है, देर तब तक नहीं होती, जब तक हम खुद से नहीं हारते। और हारे हुए लोग दुनिया को तो क्‍या, अपनी जिंदगी को भी खूबसूरत नहीं बना सकते।

8.09.2014

सपने में फासिस्‍टों का नाच

संदीप संवाद


Courtesy: The Guardian
मुझे अक्‍सर एक सपना आता है। सपने में, भारत के कुछ चरम-परम-गरम फासिस्‍टों को जनता ने चौराहे पर घेर रखा है। उन्‍हें ना कोई मार रहा है ना पीट रहा है। बस कुछ नौजवान एकठो म्‍यूजिक सिस्‍टम लाए हैं, और उसमें वेंगा ब्‍वॉयज का गाना 'ब्राजील...तारा रा तारा रारा रा' चला देते हैं। उसके बाद वे उन फासिस्‍टों को उस भोंडे गीत पर नाचने के लिए कहते हैं, चाहे उनकी मूंछों का कट कैसा भी हो। कुछेक नाचने वालों ने कच्‍छे पहने हुए हैं।
अचानक भीड़ में से कुछ बच्‍चे आगे निकलते हैं और हिटलर के पड़पोतों की मूंछे मरोड़ देते हैं,  इधर नौजवान उन्‍हें लगातार नाचते रहने को मजबूर कर रहे हैं। जनता ठहाके लगा-लगा कर तालियां पीट रही है, बच्‍चे लगातार उनकी मूंछें खींचते जा रहे हैं और कच्‍छे वालों के कच्‍छे खींच कर उन्‍हें तंग कर रहे हैं।

वैंगा ब्‍वॉयज का बेहूदा प्रलाप 'ब्राजील...' तेज़ आवाज़ में जारी है। जनता से घिरे फासिस्‍ट कोई चारा न देख, नाचते हुए अजीब-अजीब से मुंह बना रहे हैं, और बच्‍चे उनकी मूंछें-कच्‍छे खींचते हुए हंस रहे हैं।

पृष्‍ठभूमि में कभी संसद तो कभी लाल किला नजर आता है.... उधर, खाकी वर्दियों का रंग बदल कर रोटी जैसा होता जा रहा है। हथियार ---  फावड़े, कुदाल, हंसिया, ट्रैक्‍टर बनते जा रहे  हैं।

इस पूरी अवधि के दौरान, फासिस्‍ट बिना थमे वैंगा ब्‍याज के गीत पर नाचे जा रहे हैं। जनता अब भी तंज कसती हुई तालियां पीट रही है, बच्‍चे उनकी नाक के नीचे तराशी गयी मूंछे खींच-खींच कर उखाड़े दे रहे हैं--- ब्राजील.....

अचानक सपना टूट जाता है। देखता हूं कि पंद्रह अगस्‍त को लाल किले पर भाषण देते हुए एक फासिस्‍ट को बार-बार टीवी पर दिखाया जा रहा है। उसके वहां पहुंचने से पहले स्‍कूली बच्‍चों को सजधज कर तरह-तरह के रंगारंग कार्यक्रम पेश करने पड़े। चारों तरफ सुरक्षा का पुख्‍ता बंदोबस्‍त है....


मैं तुरंत टीवी बंद करता हूं, फिर आंखें बंद करके एक नींद लेने के इरादे से लेट जाता हूं।

10.31.2013

मुक्तिबोध : एक संस्मरण -- हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई
भोपाल के हमीदिया अस्पताल में मुक्तिबोध जब मौत से जूझ रहे थे, तब उस छटपटाहट को देखकर मोहम्मद अली ताज ने कहा था -



उम्र भर जी के भी न जीने का अन्दाज आया
    जिन्दगी छोड़ दे पीछा मेरा मैं बाज आया


                                   ------------------------
जो मुक्तिबोध को निकट से देखते रहे हैं, जानते हैं कि दुनियावी अर्थों में उन्हें जीने का अन्दाज कभी नहीं आया। वरना यहाँ ऐसे उनके समकालीन खड़े हैं, जो प्रगतिवादी आन्दोलन के कन्धे पर चढ़कर 'नया पथ' में फ्रन्ट पेजित भी होते थे, फिर पण्डित द्वारकाप्रसाद मिश्र की कृष्णयान का धूप-दीप के साथ पाठ करके फूलने लगे और अब जनसंघ की राजमाता की जय बोलकर फल रहे हैं। इसे मानना चाहिए कि कि पुराने प्रगतिवादी आन्दोलन ने भी मुक्तिबोध का प्राप्य नहीं दिया। बहुतों को दिया। कारण, जैसी स्थूल रचना की अपेक्षा उस समय की जाती थी, वैसी मुक्तिबोध करते नहीं थे। न उनकी रचना में कहीं सुर्ख परचम था, न प्रेमिका को प्रेमी लाल रूमाल देता था, न वे उसे लाल चूनर पहनाते थे। वे गहरे अंतर्द्वंद्व और तीव्र सामाजिक अनुभूति के कवि थे। मजे की बात है कि जो निराला की सूक्ष्मता को पकड़ लेते थे, वे भी मुक्तिबोध की सूक्ष्मता को नहीं पकड़ते थे।

दूसरी तरफ के लोग उनके पीछे विच हण्ट लगाए थे। उनके ऊबड़-खाबड़पन से अभिजात्य को मतली आती थी। वे उनके दूसरे खेमे में होने की बात को इस तरह से कहते थे, जैसे - ए गुड मैन फालन अमांग फैबियंस।

हरिपाल त्यागी की कूची से मुक्तिबोध
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10.29.2013

राजेन्द्र यादव : नई कहानी आन्दोलन की यशस्वी त्रयी का आख़िरी स्तम्भ भी नहीं रहा


प्रेस विज्ञप्ति

राजेंद्र यादव
लखनऊ, 29 अक्टूबर। ‘हंस’ के सम्पादक और प्रख्यात साहित्यकार राजेन्द्र यादव के निधन पर आज यहां ‘जनचेतना’ और राहुल फाउण्डेशन की ओर से हुई बैठक में गहरा शोक व्यक्त किया गया और उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि दी गई।

राहुल फाउण्डेशन की अध्यक्ष और लेखिका कात्यायनी ने कहा कि राजेन्द्र यादव के निधन से नई कहानी आन्दोलन की यशस्वी त्रयी का आख़िरी स्तम्भ भी नहीं रहा। ‘हंस’ के ज़रिए उन्होंने दलित और स्त्री विमर्श को हिन्दी साहित्य के केन्द्र में लाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। इसके साथ ही हंस को उन्होंने विभिन्न वैचारिक बहसों का मंच बनाया और हर तरह के कट्टरपंथ के खिलाफ दृढ़ता से आवाज़ उठाते रहे। हमेशा चर्चा के केन्द्र में रहने की कला के वे महारथी थे और कई बार वे अप्रिय विवादों के केन्द्र में भी रहे, मगर उनका व्यवहार आजीवन बेहद जनवादी, खुला और स्पष्टवादिता का रहा। उनके निधन से हिन्दी साहित्य में जो खालीपन पैदा हुआ है उसे भरना बहुत मुश्किल होगा।

अन्य वक्ताओं ने राजेन्द्र जी की विभिन्न कहानियों और खासकर कट्टरपंथियों के विरुद्ध उनके सम्पादकीय लेखों को याद करते हुए कहा कि आज के समय में राजेन्द्र यादव जैसे साहित्यकारों की कमी खलेगी। इस अवसर पर सत्यम, संजय श्रीवास्तव, रामबाबू, शाकम्भरी, गीतिका, सौरभ बनर्जी, आशीष कुमार सिंह, वन्दना, अमेन्द्र कुमार, सत्येन्द्र सिंह, शिवा, शिप्रा श्रीवास्तव, लालचन्द्र, रवि कुमार आदि उपस्थित थे।

गीतिका
कृते, जनचेतना

4.14.2013

इस बार उसकी याद में...

जीने की प्रबल इच्छा सभी में होती है, और हमसे बढ़कर जिंदगी से प्यार कर भी कौन सकता है। लेकिन, वह...उसे भी तो जीने की इच्छा होगी? जैसे हर क्रांतिकारी की होती है, भले ही राजसत्ता उसे हिंसा का पुजारी साबित करे, या भोगवादी या कुछ भी और। उसे भी घूमने-फिरने की, किसी के संग-साथ की जरूरत महसूस होती होगी।

लेकिन शालिनी हम सबसे पहले इस दुनिया को अलविदा कह कर चली गयी। सोचा नहीं था कि यह सब इतनी जल्दी हो जाएगा। अंत तक लड़ी थी बहादुरी से, आखिरी मुलाकात में भी आईसीयू से निकालने की जिद और चेहरे पर मुस्कान थी। उसकी एक ना चली, मौत बड़ी बेरहम होती है, हम लोगों को भ्रम होता रहा कि उसकी सांसे चल रही हैं, लेकिन डॉक्टरों ने साबित कर दिया कि हमें भ्रम ही हो रहा है।

 
अब उसके साथ बिताए पल जेहन में घूम रहे हैं। बहुत कम मुलाकात के बावजूद, बहुत ज्यादा जगह बनायी थी उसने मेरी जिंदगी में। शायद यह कभी किसी से ना कह पाऊं। मुझे थकता देख कहती थी कि जाओ आराम कर लो, मेरी और देखभाल करना अभी तुम्हारी मजबूरी है। मैंने भी तो यही कहा था उससे कि फिलहाल आईसीयू में रहना तुम्हारी मजबूरी है; हालांकि यह भी कहा था कि मैं तुम्हारे पक्ष में हूं कि आईसीयू में नहीं रहना चाहिए, यहां तो अच्छा खासा इंसान भी बीमार हो जाए। मशीनों की आवाजें, दवाओं की गंध, मरीजों की कराहें, हल्की रोशनी, क्या यह किसी को बीमार करने के लिए काफी नहीं हैं? मेरे मजाक करने पर हंसी थी वह, और मुझ पर तीन दिन से तारी तनाव छू हो गया था, लगा था कि वह अब ठीक हो रही है... खतरा टल रहा है। पूरे शरीर पर सूजन और हिलने-डुलने में जिस असमर्थता के कारण उसे आपातस्थिति में भर्ती कराया था वह दूर होती दिख रही थी, लग रहा था कि अब जल्दी ही वह इस आपातस्थि‍ति से उबर पाएगी। 

लेकिन ऐसा नहीं हुआ, मौत हरजाई होती है, किसी को भी धोखा दे सकती है। वहां पहुंच जाती है जहां उसके पहुंचने की उम्मीद नहीं होती। एकदम असभ्य होती है कमबख्त मौत। और तब महसूस होती है अपनी लाचारी, विज्ञान का अधूरापन। क्यों नहीं बचा पाते हैं हम कीमती जिंदगियां तक! क्यों!!!???

3.04.2013

'असली इन्सान' उपन्‍यास के 'कमिसार' जैसे पात्र हवा से पैदा नहीं होते, वे आपके हमारे बीच ही जन्‍म लेते हैं









संदीप संवाद


कविता, कहानी, उपन्‍यास, नज़्म, फिल्‍म, थियेटर आदि से अक्‍सर लोगों को भावुक, प्रेरित, क्रोधित, जज्‍़बाती, उदास होते हुए देखा है। आखिर हो भी क्‍यों न, जिंदगी का संश्लिष्‍ट रूपांतरण ही तो कला होती है। कला हमारे आसपास-परिवेश को ज्‍यादा गहराई से देखने-समझने और महसूस करने के प्रति, और यहाँ तक कि जो चीज़ें हम आमतौर पर महसूस नहीं कर पाते, समझ-देख नहीं पाते उनके प्रति भी हम में संवेदन पैदा करती है। लेकिन क्‍या हमारी संवेदनाएं केवल कला की मोहताज हैं?

अपने आसपास देखने पर कई बार ऐसा ही लगता है। कॉफी हाउसों की मण्‍डलीबाजियों, कॉमरेडों के कमरों में बैठकी करते समय या सड़क पर चहलकदमी करते हुए, अक्‍सर दुनिया-जहान के दुख-दर्द, अमानवीयता, अपराध, असहिष्‍णुता, संवेदनहीनता, कैरियरवाद, असमानता, क्रांति, फिल्‍म-कला-प्रेम आदि पर बातें हो ही जाया करती हैं। लेकिन कभी-कभी इन सबके बीच, जीते-जागते, हाड़-मांस के बने इन्‍सान कहीं गुम-से हो जाते हैं। गुम हो जाती हैं उनकी तकलीफ़ें, उनके सपने, उनकी कुर्बानियां, उनकी बहादुरी...
    
     शालिनी को कैंसर होने की सूचना मिली तो सामने उसका चेहरा कौंध गया था। एक कार्यक्रम में दस साल पहले हुई मुलाकात, कुछ औपचारिक शब्‍दों का आदान-प्रदान, बस इतना ही तो! उसके बाद कार्यक्रम में शालिनी पर ध्‍यान ही नहीं गया, क्‍योंकि वह नज़र ही नहीं आती थी। कभी सरसराती हुई सामने से गुज़रती तो पता चलता कि शायद कुछ कम पड़ गया है, शालिनी उसी की व्‍यवस्‍था में जुटी है। फिर कभी-कभार मेहमानों और साथियों की ज़रूरत की चीज़ें लाते-ले जाते दिख जाती। यही पहली मुलाकात थी, और इस मुलाकात के दौरान एक बात खटकी थी कि युवा होते हुए भी वह क्‍यों इतना कम बोलती-मुस्‍कुराती है, जबकि कम्‍युनिस्‍ट तो ज़ि‍न्‍दादिल होते हैं (लेकिन उस समय शायद मेरे लिए जिंदादिली का मतलब हीं-हीं-ठीं-ठीं करना ही था, और अच्‍छा ही था कि हमारे साथी ''जिन्‍दादिल'' नहीं रहे)। खैर, बात आई-गई हो गयी और हम लोग अपनी-अपनी जगहों पर लौट आए।

     इस बीच जब भी शालिनी का नाम कहीं सुनने को मिलता, तो किसी न किसी काम के संबंध में सुनने को मिलता। शालिनी पुस्‍तक प्रतिष्‍ठान 'जनचेतना' के लखनऊ स्थित केन्‍द्र की प्रभारी है, बच्‍चों के लिए गठित संस्‍था 'अनुराग ट्रस्‍ट' की एक न्‍यासी है, परिकल्‍पना प्रकाशन की निदेशक है, राहुल फाउण्‍डेशन के प्रकाशन का काम देखती है और अरविन्‍द स्‍मृति न्‍यास का पुस्‍तकालय भी सम्‍भालती है। शालिनी ने सभी जिम्‍मेदारियों को एक कर्मठ क्रांतिकारी की तरह पूरा किया, हर तरह की कमियों-लापरवाहियों को दूर करने की दिशा में निरंतर काम किया। ऐसा करते हुए, शालिनी क्रांतिकारी अनुशासन का न सिर्फ स्‍वयं पालन किया बल्कि अन्‍य साथियों को भी ज्‍यादा दृढ़ता के साथ ऐसा करने के लिए प्रेरित किया। एक साथी मजाक में कहते कि मैं शालिनी के सामने ही नहीं पडूंगा क्‍योंकि अगर ग़लती से कोई ग़लती हो गयी, तब फिर शालिनी मुझे नहीं बख्‍शने वाली... उसूलों की बहुत पक्‍की हैं।
     एक कम्‍युनिस्‍ट के लिए सबसे तकलीफदेह यही होता है कि वह किसी वजह से अपने कामों में शिरकत न कर पाए। अब लगभग रोज की मुलाकात में महसूस भी हो रहा है कि शालिनी अपनी बीमारी से ज्‍यादा इस बात से चिड़चिड़ाती हैं कि वह अपने मोर्चे पर नहीं हैं। दर्द, तकलीफ़ वगैरह तो वह बेहद बहादुरी से झेल रही हैं, और युवा साथियों को उनसे सीखना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि निकोलाई ऑस्‍त्रोवेस्‍की, या असली इन्सान उपन्‍यास के 'कमिसार' जैसे पात्र हवा से पैदा नहीं होते, वे आपके हमारे बीच ही जन्‍म लेते हैं, यहीं पलते-बढ़ते हैं... बस एक निगाह चाहिए कि जब वास्‍तविक जीवन में ऐसे लोगों से मुलाकात हो तो हम उन्‍हें पहचान सकें।

     जो अंधे हो गए हैं, या जिनकी रगों का खून बिल्‍कुल ठंडा हो चुका है, उन्‍हें यह सब सामान्‍य लगेगा, क्‍योंकि शालिनी के जीवन पर ना कोई कहानी लिखी गई है, ना कविता, और ना ही फिल्‍म बनी है जो लोगों के दिल-दिमाग को झकझोरे; लेकिन मुर्दानगी छोड़कर शालिनी से मिलिए तो सही!!! उनकी आंखें बोलती हैं, ''ठहरो कॉमरेड, कुछ दिन आराम करना पड़ रहा है, फिर सारा काम पहले की तरह संभाल लूंगी और बेहतर ही संभालूंगी!"

      जल्‍दी किसी से 'कॉमरेड' बोलने का मन नहीं करता, लेकिन आज कर रहा है: ''हां कॉमरेड शालिनी, हमें बेसब्री से इंतज़ार है कि आप अपने मोर्चे पर लौटें, और हम लोग फिर जुट जाए काम में...!!!''

शालिनी का ब्‍लॉग: एक क्रान्तिकारी की जीवनरक्षा का अभियान

9.10.2011

चीनी विशेषता वाले ”समाजवाद” में मज़दूरों के स्वास्थ्य की दुर्गति


संदीप संवाद


माओ त्से.तुड. और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देड.पन्थी ‘सुधारों’ के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाफों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की फीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है।



क्रान्तिकारी चीन में स्वास्थ्य की स्थिति

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में 1949 में सर्वहारा वर्ग सत्ता पर काबिज़ हुआ तो उसने मेहनतकश जनता के लिए, जोकि अधिकांशतः ग्रामीण इलाकों में रहती थी, स्वास्थ्य सेवाओं का एक तन्त्र विकसित किया था। सभी अस्पतालों का स्वामित्व फण्डिंग और संचालन सरकार की ज़िम्मेदारी थी और निजी तौर पर स्वास्थ्य सेवाएँ देने का चलन बन्द हो गया। ग्रामीण इलाकों में कम्यून ही स्वास्थ्य सेवाओं सहित अन्य सामाजिक सेवाओं की आपूर्ति भी करते थे। अधिकांश स्वास्थ्य सेवाएँ सहकारी चिकित्सा तन्त्र के जरिए उपलब्ध करायी जाती थीं, जो गाँवों और शहरों के स्वास्थ्य केन्द्रों के माध्यम से ये सेवाएँ प्रदान करता था। इन स्वास्थ्य केन्द्रों का दायित्व पश्चिमी और पारम्परिक चीनी उपचार के लिए बुनियादी प्रशिक्षण प्राप्त बेयरफुट डाक्टर सँभालते थे। इन सब प्रयासों का परिणाम आश्चर्यजनक था। 1952 से 1982 तक, शिशु मृत्यु दर प्रति एक हज़ार पर 200 से घटकर 34 रह गयी थी और औसत आयु 35 से बढ़कर 68 वर्ष हो गयी थी। (बेयरफुट यानी नंगे पाँव वाले डाक्टर चीन का एक अद्भुत प्रयोग था। इसके तहत हज़ारों लोगों को इलाज का बुनियादी प्रशिक्षण देकर गाँवों और शहरों में भेजा गया थां आम तौर पर होनेवाली बीमारियों के इलाज के साथ.साथ वे लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारियाँ भी देते थे।)

संशोधनवादियों के सत्ता पर काबिज़ होने के बाद 1980 के आरम्भ में, चीन की अर्थव्यवस्था के विकेन्द्रीकरण और निजीकरण के कारण उसका स्वास्थ्य सेवा तन्त्र चरमरा गया क्योंकि अब उत्पादन, राज.काज और वितरण सर्वहारा वर्ग के बजाय पूँजीपति वर्ग के हाथों में आ गया था। अब संशोधनवादी सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं में ख़र्च को 1978 के 32 प्रतिशत की तुलना में घटाकर 1999 में 15 प्रतिशत कर दिया और यह ज़िम्मेदारी प्रान्तीय और स्थानीय अधिकारियों के सिर मढ़ दी। इससे, सम्पन्न तटीय प्रान्तों को लाभ हुआ और शहरी तथा ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में अन्तर बढ़ गया। निजीकरण के बाद स्वास्थ्य सेवाएँ अपने ख़र्चों की भरपाई के लिए निजी बाज़ार में सेवाएँ बेचने के लिए बाध्य हो गयीं।

हालाँकिए कम्युनिस्ट होने का दिखावा करने के लिए संशोधनवादी सरकार ने नियमित चिकित्सकीय मुलाकात और आपरेशानोँ, सामान्य नैदानिक परीक्षणों और नियमित दवाओं की कीमतों पर नियन्त्रण बनाये रखा। फ़िर भी, स्वास्थ्य केन्द्र नयी दवाओं और परीक्षणों से मुनाफा कमा सकते थे। बेहद मुनाफा देने वाली नयी दवाओं और तकनोलाजियोँ के जरिए राजस्व बटोरने पर अस्पतालों के चिकित्सकों को बोनस दिया जाने लगा। स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतों में बढ़ोत्तरी से महँगी दवाओं और उच्च तकनीकी सेवाओं की बिक्री में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई। इन सब कारणों से चीन की आम जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ हासिल करना मुश्किल हो गया। इसका कारण यह भी था कि कृषि अर्थव्यवस्था के निजीकरण के कारण 90 करोड़ ग़रीब ग्रामीण जनता अब असुरक्षित हो गयी है और उसका चिकित्सा बीमा नहीं है। बेयरफुट डाक्टर निजी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने को मजबूर हो गए। उन्होंने तनख़्वाहों और सुविधाओं में कटौती के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ देना बन्द कर दिया, और दवाएँ बेचना शुरू कर दिया जिसके ज़रिये अपनी बुनियादी जरूरतें पूरा करना आसान था। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी दवाओं की कीमतों में तेज़ी से वृद्धि हुई।

अर्थव्यवस्था के साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य तन्त्र के निजीकरण के बाद केन्द्र सरकार ने स्थानीय सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के कोष में कटौती कर दी। इसकी भरपायी के लिए स्थानीय सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को यह छूट दी गयी कि वे व्यक्तिगत स्वास्थ्य सेवाओं और होटलों तथा रेस्टोरेण्ट आदि में स्वच्छता के निरीक्षण आदि का शुल्क वसूल कर आमदनी जुटायें। इसके साथ ही स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने आमदनी बढ़ाने वाली गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित कर दिया और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता.शिक्षाए माँओं और बच्चों के स्वास्थ्य तथा महामारियों पर नियन्त्रण की उपेक्षा करना शुरू कर दिया।

जैसाकि होना था, “बाज़ार समाजवाद” की नीतियों के कारण गाँव.शहर, अमीर.ग़रीब, शारीरिक श्रम.मानसिक श्रम के बीच की खाई निरन्तर चौड़ी होती गयी। आय में असमानता के कारण शहरी मध्यवर्ग और अन्य खाते.पीते तबके के बीच स्वास्थ्य सेवाओं की खपत ग्रामीण जनता की तुलना में तीन गुना ज़्यादा हो गयी। 1999 में, चीन की 49 प्रतिशत शहरी जनता के पास स्वास्थ्य बीमा था, जबकि ग्रामीण जनता में केवल 7 प्रतिशत को ही यह सुविधा उपलब्ध थी। ये 7 प्रतिशत भी ज़्यादातर नये उभरे धनी किसान और खाते.पीते किसान थे।

8.31.2011

मारुति सुज़ुकी, मानेसर के आन्‍दोलनरत मज़दूरों की प्रबुद्ध मीडियाकर्मियों से अपील


आदरणीय मीडियाकर्मियों,

जिस वक्‍त दिल्‍ली में जन लोकपाल के मुद्दे पर आन्‍दोलन की सफलता का जश्‍न मनाया जा रहा था, ठीक उसी वक्‍त राजधानी दिल्‍ली के ऐन बगल में हज़ारों ग़रीब मज़दूरों के लोकतांत्रिक अधिकारों का गला घोंटा जा रहा था। आपको पता ही होगा कि किस तरह से भारत की सबसे बड़ी कार कम्‍पनी मारुति सुज़ुकी इंडिया लिमिटेड के मैनेजमेण्‍ट ने 29 अगस्‍त की सुबह से मानेसर, गुड़गांव स्थित कारख़ाने में जबरन तालाबन्‍दी कर दी है। मैनेजमेण्‍ट ने अनुशासनहीनता और 'काम धीमा करने' का झूठा आरोप लगाकर 11 स्‍थायी मज़दूरों को बर्खास्‍त कर दिया है और 10 को निलम्बित कर दिया है। कम्‍पनी ने एक निहायत तानाशाहीभरा और सरासर ग़ैरक़ानूनी ''उत्तम आचरण शपथपत्र'' (गुड कंडक्‍ट बॉण्‍ड) भी मज़दूरों पर थोप दिया है और यह फ़रमान जारी कर दिया है कि जो मज़दूर इस पर हस्‍ताक्षर नहीं करेगा उसे ''हड़ताल पर'' माना जाएगा और कारख़ाने में दाखिल नहीं होने दिया जाएगा।
इस पत्र के अन्‍त में बॉण्‍ड का पाठ दिया गया है, आप स्‍वयं उसे पढ़कर देख सकते हैं कि यह किस कदर अलोकतांत्रिक और निरंकुश है और भारत के संविधान में उल्लिखित मूलभूत अधिकारों का हनन करता है।
आपने यह भी पढ़ा और देखा ही होगा कि मारुति सुजु़की के हम मज़दूर किन परिस्थितियों में काम करते हैं। राज्‍य द्वारा पारित श्रम क़ानूनों के तहत हमें अपनी स्‍वतंत्र यूनियन बनाने का अधिकार है लेकिन कम्‍पनी के कहने पर हमें ग़ैरक़ानूनी तरीके से इस बुनियादी अधिकार से भी वंचित किया जा रहा है ताकि हम अपने साथ होने वाले अन्‍याय के विरुद्ध आवाज़ न उठा सकें।
आप लोगों ने अण्‍णा जी के आन्‍दोलन को अभूतपूर्व कवरेज और समर्थन दिया है। मीडिया के इस प्रचण्‍ड समर्थन और सहयोग के बिना यह आन्‍दोलन न इतना व्‍यापक हो सकता था और न ही इतना सफल। आप लोग जनता के अधिकारों और न्‍याय तथा लोकतंत्र की बात करते हैं। क्‍या इन घनघोर अलोकतांत्रिक कार्रवाइयों के विरुद्ध मज़दूरों के संघर्ष को आपका समर्थन और सहयोग नहीं मिलेगा? क्‍या मज़दूरों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित करना भ्रष्‍टाचार नहीं है? क्‍या सरकार और कम्‍पनी मैनेजमेण्‍ट की यह मिलीभगत जनता के प्रतिनिधियों द्वारा जनता से विश्‍वासघात और भ्रष्‍टाचार का मामला नहीं है? क्‍या इस संघर्ष को मात्र इतनी कवरेज मिलेगी कि दिन में एक-दो बार कुछ सेकंड का समाचार दे दिया जाये जिसमें इस बात की चिन्‍ता अधिक हो कि मज़दूरों के आन्‍दोलन के कारण कम्‍पनी को कितना घाटा हो रहा है? हमें ऐसी कोई रिपोर्ट देखने को नहीं मिली जिसमें जन लोकपाल आन्‍दोलन के कारण देश में उत्‍पादन को हुए घाटे का हिसाब लगाया हो। फिर मज़दूरों के साथ ही यह दोहरा रवैया क्‍यों?
साभार : हिंदू बिज़नस लाइन
यह प्रश्‍न केवल मारुति के एक कारखाने के 3000 मज़दूरों का नहीं है। गुड़गांव के लाखों मज़दूरों और देशभर के करोड़ों मज़दूरों के साथ रोज़ यही सलूक होता है। गुड़गांव और उसके आसपास फैले विशाल औद्योगिक क्षेत्र में स्थित सैकड़ों कारख़ानों में कम से कम 20 लाख मज़दूर काम करते हैं। अकेले आटोमोबाइल उद्योग की इकाइयों में करीब 10 लाख मज़दूर काम करते हैं। अत्‍याधुनिक कारखानों में दुनिया भर की कंपनियों के लिए आटो पार्ट्स बनाने वाले ये मज़दूर बहुत बुरी स्थितियों में काम करते हैं। इनमें से 90 प्रतिशत से भी अधिक ठेका मज़दूर हैं जो 4000-5000 रुपये महीने पर 10-10, 12-12 घंटे काम करते हैं, काम की रफ़्तार और बोझ बेहद अधिक होता है और लगातार सुपरवाइज़रों तथा सिक्‍योरिटी वालों की गाली-गलौज और मारपीट तक सहनी पड़ती है।
हम आपसे और सभी मीडिया कर्मियों से अपील करते हैं कि अन्‍याय और निरंकुशता के विरुद्ध मूलभूत  लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए इस संघर्ष में हमारा साथ दें। आप मीडियाकर्मी के साथ ही एक प्रबुद्ध और ज़ि‍म्‍मेदार नागरिक भी हैं। हम चाहते हैं कि मज़दूरों की न्‍यायसंगत मांगों को स्‍वीकार करने के लिए आप सरकार पर भी दबाव डालें। हम आपको कारखाना गेट पर धरना स्‍थल पर भी आमंत्रित करते हैं।
अग्रिम धन्‍यवाद और सादर अभिवादन सहित,

-- बिगुल मज़दूर दस्‍ता तथा मारुति सुज़ुकी एवं गुड़गांव के विभिन्‍न कारख़ानों में काम करने वाले कुछ मज़दूर
संपर्क: सत्‍यम (9910462009), रूपेश (9213639072),  सौरभ (9811841341)
                                                              http://www.petitiononline.com/MSIL298/petition.html
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उत्तम आचरण का शपथपत्र
प्रमाणित स्‍थायी आदेश के अनुच्‍छेद 25(3) की शर्तों के अनुसार
मैं,…………………………………. सुपुत्र, श्री  ................स्‍टाफ संख्‍या.................एतदद्वारा स्‍वेच्छा से और बिना किसी दबाव में आए, प्रमाणित स्‍थायी आदेश के अनुच्‍छेद 25(3) के अनुसार इस उत्तम आचरण शपथपत्र को लागू करता हूं और इस पर हस्‍ताक्षर करता हूं। मैं शपथ लेता हूं कि अपनी ड्यूटी ज्‍वाइन करने पर मैं अनुशासनबद्ध होकर सामान्‍य उत्‍पादन कार्य करूंगा और मैं धीमे काम नहीं करूंगा,  बीच-बीच में काम नहीं रोकूंगा, कारख़ाने के भीतर रुककर हड़ताल नहीं करूंगा, नियमानुसार काम (वर्क टु रूल) नहीं करूंगा, तोड़फोड़ या कारखाने के सामान्‍य उत्‍पादन को प्रभावित करने वाली अन्‍य किसी गतिविधि में भाग नहीं लूंगा। मुझे ज्ञात है कि धीमे काम कम करना, बीच-बीच में काम रोकना, कारख़ाने के भीतर रुककर हड़ताल करना (), या सामान्‍य उत्‍पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली कोई भी गतिविधि प्रमाणित स्‍थायी आदेश के तहत गंभीर दुराचरण की श्रेणी में आती है और ऐसा कोई भी कार्य करने पर प्रमाणित स्‍थायी आदेश के अनुच्‍छेद 30 के तहत दिए जाने वाले दंड में,  बिना नोटिस के काम से निकाला जाना शामिल है। अत:, मैं एतदद्वारा सहमति देता हूं कि यदि, ड्यूटी ज्‍वाइन करने के बाद, मुझे काम धीमा करने, बीच-बीच में काम रोकने, स्‍टे-इन स्‍ट्राइक करने,  वर्क टु रूल करने, तोड़फोड़ या सामान्‍य उत्‍पादन को बाधित करने वाली किसी भी अन्‍य गतिविधि में शामिल पाया जाता है, तो मुझे प्रमाणित स्‍थायी आदेश के तहत सेवा से  बर्खास्‍त किया जा सकता है।

दिनांक :........................                                                      कर्मचारी के हस्‍ताक्षर

8.27.2011

देर रात गये पाश से हुई मुलाकात

देर रात गये पाश से हुई मुलाकात
चारूचंद्र पाठक


अवतार सिंह 'पाश'
कल देर रात न्‍यूज चैनल में छाए भ्रष्‍टाचार-विरोधी अन्‍ना-आंदोलन की खबरों और रामलीला मैदान में गूंज रहे वंदे मातरम और इंकलाब जिंदाबाद के नारों को देखते-सुनते हुए, अचानक मेरी निगाह अपनी बगल में रखे स्‍टूल पर बैठे पाश पर गई। मैं पाश को अपने सामने देखकर चौंक पड़ा। पाश तो 23 मार्च, 1988 को ही ख़लिस्‍तानियों के हाथों शहीद हो गये थे... फिर यहां... इस वक्‍त...
मैं इन्‍हीं खयालों में डूबा और असमंजस में पड़ा हुआ एकटक उन्‍हें देखे जा रहा था, और वे चुपचाप मंद-मंद मुस्‍करा रहे थे। मैं जाने और कितनी देर उन्‍हें यूं ही देखता रहता, अगर उन्‍होंने मेरा हाथ अपने हाथों में लेकर यह न कहा होता, ''इंसान अपने विचारों के रूप में हमेशा जिंदा रहता है...''



मैं अब भी पशो-पेश में था, दिमाग अचानक ब्‍लैंक हो गया था...

पाश ने टीवी की तरफ इशारा करके कहा, ''तमाशा जारी है?''

मैंने कहा, ''हां, आजकल पूरे मीडिया और देश में बस यही छाया हुआ है...'' मेरा दिमाग़ अभी पूरी तरह शांत नहीं पाया था। मैंने पाश से पूछा, ''आपकी इस पर क्‍या राय है?''

पाश हँसे, ''मेरी राय तो तुमने अपनी किताबों की सेल्‍फ में लगा रखी है!!!''
मैंने पलटकर किताबों के शेल्‍फ पर नजर डाली और पाश का कविता संकलन ''अक्षर-अक्षर'' नज़र आया। मैंने हाथ बढ़ाकर किताब निकाल ली, और पाश की तरफ देखा...

पाश ने मेरे हाथ से किताब ले ली, और कहा, ''इसमें है मेरी राय। फिर भी, अगर कुछ खास सवाल हों, तो बोलो, मैं तुम्‍हें अपने विचार बता दूंगा।''

पाश की मौजूदगी से मैं अब भी चकित था।

मैं : ''यह कहा जा रहा है कि अब हिन्‍दुस्‍तान से भ्रष्‍टाचार खत्‍म हो जाएगा... देश में एक बड़ा परिवर्तन आ जाएगा...''

पाश :
''हम झूठ-मूठ का कुछ भी नहीं चाहते
जिस तरह हमारे बाजुओं में मछलियां हैं,
जिस तरह बैलों की पीठ पर उभरे
सोटियों के निशान हैं,
जिस तरह कर्ज के कागजों में
हमारा सहमा और सिकुड़ा भविष्‍य है
हम जिंदगी, बराबरी या कुछ भी और
इसी तरह सचमुच का चाहते हैं
....
हम झूठ-मूठ का कुछ भी नहीं चाहते
और हम सबकुछ सचमुच का देखना चाहते हैं --
जिंदगी, समाजवाद, या कुछ भी और...।''
(कविता का शीर्षक -- प्रतिबद्धता)

मैंने पूछा, ''एक और नया कानून बनाने की बात चल रही है, जिससे देश में भ्रष्‍टाचार समाप्‍त हो जाएगा। आपको क्‍या लगता है?''

पाश ने किताब के पन्‍ने पलटकर एक कविता की ओर इशारा कर दिया :-

''यह पुस्‍तक मर चुकी है
इसे मत पढ़ो
इसके लफ्जों में मौत की ठण्‍डक है
और एक-एक पन्‍ना
जिंदगी के अंतिम पल जैसा भयानक
यह पुस्‍तक जब बनी थी
तो मैं एक पशु था
सोया हुआ पशु
और जब मैं जागा
तो मेरे इंसान बनने तक
ये पुस्‍तक मर चुकी थी
अब अगर इस पुस्‍तक को पढ़ोगे
तो पशु बन जाओगे
सोये हुए पशु।''
(कविता का शीर्षक -- संविधान)

मैं : ''शांति और अहिंसा के गाँधीवादी सिद्धांतों से क्‍या कोई नया मानव-केंद्रित सामाजिक परिवर्तन संभव है?''
मेरे सामने एक और कविता आ गई :
हम जिस शान्ति के लिए रेंगते रहे
वो शान्ति बाघों के जबड़ों में
स्‍वाद बनकर टपकती रही।
शान्ति कहीं नहीं होती --
रूहों में छिपे गीदड़ों का हुआना ही सबकुछ है।
शान्ति
घुटनों में सिर देकर जिंदगी को सपने में देखने का यत्‍न है।
शान्ति यूं कुछ नहीं है।
...
शान्ति गलीज विद्वानों के मुंह से टपकती लार है
शान्ति पुरस्‍कार लेते कवियों के बढ़े हुए बाजूओं का टुण्‍ड है
शान्ति वजीरों के पहने हुए खद्दर की चमक है
शान्ति और कुछ नहीं है
या शान्ति गाँधी का जांघिया है
जिसकी तनियों को चालीस करोड़ लोगों को फांसी लगाने के लिए
प्रयुक्‍त किया जा सकता है
(कविता का शीर्षक -- युद्ध और शांति)

मैं : ''यही नहीं इसे आजादी की दूसरी लड़ाई और नई क्रांति भी कहा जा रहा है?''

पाश : (इस बार वे स्‍वयं कविता पढ़ रहे थे...)

''क्रांति कोई दावत नहीं, नुमाइश नहीं
मैदान में बहता दरिया नहीं
वर्गों का, रुचियों का दरिन्‍दाना भिड़ना है
मरना है, मारना है
और मौत को खत्‍म करना है।
(कविता का शीर्षक -- खुला खत)''

मैं : ''इस तरह तो आप इस आंदोलन की सारी बातों की ही खारिज नहीं कर रहे हैं?''

पाश :
''अभी मैं धरती पर छाई
किसी साझी के काले-स्‍याह होंठों जैसी रात की ही बात करूंगा
उस इतिहास की
जो मेरे बाप के धूप से झुलसे कंधों पर उकरा है
या अपनी मां के पैरों में फटी बिवाइयों के भूगोल की बात करूंगा
मुझसे आस मत रखना कि मैं खेतों का पूत होकर
तुम्‍हारे जुगाले हुए स्‍वादों की बात करूंगा''
(कविता का शीर्षक -- इन्‍कार)

मैं : ''पूरा मीडिया मानो इस आंदोलन के समर्थन में जी-जान से जुटा हुआ है!!!''

पाश :
''वे संपादक और उस जैसे हजारों लोग
अपनी भद्दी देह पर सवार होकर आते हैं
तो गांव की पगडंडियों पर
घास में से हरी चमक मर जाती है

यह लोग असल में रोशनी के पतंगों जैसे हैं
जो दीया जलाकर पढ़ रहे बच्‍चों की नासिकाओं में
कचायंध का भभूका बनकर चढ़ते हैं।
मेरे शब्‍द उस दीये में
तेल की जगह जलना चाहते हैं
मुझे कविता का इससे बेहतर इस्‍तेमाल नहीं पता...''
(कविता का शीर्षक -- तुझे नहीं पता)

मैं : ''अन्‍ना के अलावा मानो कोई खबर ही नहीं बची हो!!!''

पाश :
''मैं आजकल अखबारों से बहुत डरता हूं
जरूर उनमें कहीं न कहीं
कुछ न होने की खबर छपी होगी।
शायद तुम नहीं जानते, या जानते भी हों
कि कितना भयानक है कहीं भी कुछ न होना
लगातार नजरों का हांफते रहना
और चीजों का चुपचाप लेटे रहना किसी ठंडी औरत की तरह।''
(कविता का शीर्षक -- लड़े हुए वर्तमान के रूबरू)

मैं : ''मुझे जिस बात ने बेहद परेशान किया वह यह कि इसके समर्थक किसी तर्क, सवाल या संदेह को सुनना ही नहीं चाहते। ऐसा करने वाले को देशद्रोही कह दिया जाता है।''

पाश : यह भी कोई नई बात नहीं है। इसे सुनो :
''अपने लोगों से प्‍यार का अर्थ
'दुश्‍मन देश' की एजेण्‍टी होता है।
और
बड़ी से बड़ी गद्दारी का तमगा
बड़े से बड़े रुतबा हो सकता है
तो --
दो और दो तीन भी हो सकते हैं।
वर्तमान मिथिहास हो सकता है।
मनुष्‍य की शक्‍ल भी चमचे जैसी हो सकती है।''
(कविता का शीर्षक -- दो और दो तीन)

मैं : ''और ये 'इन्‍कलाब जिंदाबाद' के क्‍या अर्थ बताए जा रहे है? मैं तो इसका एक ही अर्थ जानता हूं जिसे भगतसिंह ने बताया था।''