Showing posts with label मेरे विचार. Show all posts
Showing posts with label मेरे विचार. Show all posts

9.10.2011

चीनी विशेषता वाले ”समाजवाद” में मज़दूरों के स्वास्थ्य की दुर्गति


संदीप संवाद


माओ त्से.तुड. और कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में हुई चीनी क्रान्ति के बाद जिस मेहनतकश वर्ग ने अपना ख़ून-पसीना एक करके समाजवाद का निर्माण किया था, कल-कारख़ाने, सामूहिक खेती, स्कूल, अस्पतालों को बनाया था, वह 1976 में माओ के देहान्त के बाद 1980 में शुरू हुए देड.पन्थी ‘सुधारों’ के चलते अब बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं तक से महरूम है। जिस चीन में समाजवाद के दौर में सुदूर पहाड़ी इलाफों से लेकर शहरी मज़दूरों तक, सबको मुफ्त चिकित्सा उपलब्ध थी, वहाँ अब दवाओं के साथ-साथ परीक्षणों की फीमत और डाक्टरों की फीस आसमान छू रही है। आम मेहनतकश जनता अब दिन-रात खटने के बाद, पोषक आहार न मिल पाने से या पेशागत कारणों से बीमार पड़ती है तो उसका इलाज तक नहीं हो पाता और वह तिलतिलकर मरने को मजबूर होती है।



क्रान्तिकारी चीन में स्वास्थ्य की स्थिति

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में 1949 में सर्वहारा वर्ग सत्ता पर काबिज़ हुआ तो उसने मेहनतकश जनता के लिए, जोकि अधिकांशतः ग्रामीण इलाकों में रहती थी, स्वास्थ्य सेवाओं का एक तन्त्र विकसित किया था। सभी अस्पतालों का स्वामित्व फण्डिंग और संचालन सरकार की ज़िम्मेदारी थी और निजी तौर पर स्वास्थ्य सेवाएँ देने का चलन बन्द हो गया। ग्रामीण इलाकों में कम्यून ही स्वास्थ्य सेवाओं सहित अन्य सामाजिक सेवाओं की आपूर्ति भी करते थे। अधिकांश स्वास्थ्य सेवाएँ सहकारी चिकित्सा तन्त्र के जरिए उपलब्ध करायी जाती थीं, जो गाँवों और शहरों के स्वास्थ्य केन्द्रों के माध्यम से ये सेवाएँ प्रदान करता था। इन स्वास्थ्य केन्द्रों का दायित्व पश्चिमी और पारम्परिक चीनी उपचार के लिए बुनियादी प्रशिक्षण प्राप्त बेयरफुट डाक्टर सँभालते थे। इन सब प्रयासों का परिणाम आश्चर्यजनक था। 1952 से 1982 तक, शिशु मृत्यु दर प्रति एक हज़ार पर 200 से घटकर 34 रह गयी थी और औसत आयु 35 से बढ़कर 68 वर्ष हो गयी थी। (बेयरफुट यानी नंगे पाँव वाले डाक्टर चीन का एक अद्भुत प्रयोग था। इसके तहत हज़ारों लोगों को इलाज का बुनियादी प्रशिक्षण देकर गाँवों और शहरों में भेजा गया थां आम तौर पर होनेवाली बीमारियों के इलाज के साथ.साथ वे लोगों को स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारियाँ भी देते थे।)

संशोधनवादियों के सत्ता पर काबिज़ होने के बाद 1980 के आरम्भ में, चीन की अर्थव्यवस्था के विकेन्द्रीकरण और निजीकरण के कारण उसका स्वास्थ्य सेवा तन्त्र चरमरा गया क्योंकि अब उत्पादन, राज.काज और वितरण सर्वहारा वर्ग के बजाय पूँजीपति वर्ग के हाथों में आ गया था। अब संशोधनवादी सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं में ख़र्च को 1978 के 32 प्रतिशत की तुलना में घटाकर 1999 में 15 प्रतिशत कर दिया और यह ज़िम्मेदारी प्रान्तीय और स्थानीय अधिकारियों के सिर मढ़ दी। इससे, सम्पन्न तटीय प्रान्तों को लाभ हुआ और शहरी तथा ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में अन्तर बढ़ गया। निजीकरण के बाद स्वास्थ्य सेवाएँ अपने ख़र्चों की भरपाई के लिए निजी बाज़ार में सेवाएँ बेचने के लिए बाध्य हो गयीं।

हालाँकिए कम्युनिस्ट होने का दिखावा करने के लिए संशोधनवादी सरकार ने नियमित चिकित्सकीय मुलाकात और आपरेशानोँ, सामान्य नैदानिक परीक्षणों और नियमित दवाओं की कीमतों पर नियन्त्रण बनाये रखा। फ़िर भी, स्वास्थ्य केन्द्र नयी दवाओं और परीक्षणों से मुनाफा कमा सकते थे। बेहद मुनाफा देने वाली नयी दवाओं और तकनोलाजियोँ के जरिए राजस्व बटोरने पर अस्पतालों के चिकित्सकों को बोनस दिया जाने लगा। स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतों में बढ़ोत्तरी से महँगी दवाओं और उच्च तकनीकी सेवाओं की बिक्री में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई। इन सब कारणों से चीन की आम जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ हासिल करना मुश्किल हो गया। इसका कारण यह भी था कि कृषि अर्थव्यवस्था के निजीकरण के कारण 90 करोड़ ग़रीब ग्रामीण जनता अब असुरक्षित हो गयी है और उसका चिकित्सा बीमा नहीं है। बेयरफुट डाक्टर निजी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करने को मजबूर हो गए। उन्होंने तनख़्वाहों और सुविधाओं में कटौती के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएँ देना बन्द कर दिया, और दवाएँ बेचना शुरू कर दिया जिसके ज़रिये अपनी बुनियादी जरूरतें पूरा करना आसान था। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी दवाओं की कीमतों में तेज़ी से वृद्धि हुई।

अर्थव्यवस्था के साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य तन्त्र के निजीकरण के बाद केन्द्र सरकार ने स्थानीय सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के कोष में कटौती कर दी। इसकी भरपायी के लिए स्थानीय सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को यह छूट दी गयी कि वे व्यक्तिगत स्वास्थ्य सेवाओं और होटलों तथा रेस्टोरेण्ट आदि में स्वच्छता के निरीक्षण आदि का शुल्क वसूल कर आमदनी जुटायें। इसके साथ ही स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने आमदनी बढ़ाने वाली गतिविधियों पर ध्यान केंद्रित कर दिया और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता.शिक्षाए माँओं और बच्चों के स्वास्थ्य तथा महामारियों पर नियन्त्रण की उपेक्षा करना शुरू कर दिया।

जैसाकि होना था, “बाज़ार समाजवाद” की नीतियों के कारण गाँव.शहर, अमीर.ग़रीब, शारीरिक श्रम.मानसिक श्रम के बीच की खाई निरन्तर चौड़ी होती गयी। आय में असमानता के कारण शहरी मध्यवर्ग और अन्य खाते.पीते तबके के बीच स्वास्थ्य सेवाओं की खपत ग्रामीण जनता की तुलना में तीन गुना ज़्यादा हो गयी। 1999 में, चीन की 49 प्रतिशत शहरी जनता के पास स्वास्थ्य बीमा था, जबकि ग्रामीण जनता में केवल 7 प्रतिशत को ही यह सुविधा उपलब्ध थी। ये 7 प्रतिशत भी ज़्यादातर नये उभरे धनी किसान और खाते.पीते किसान थे।

1.16.2008

इस ज़मीन पर नहीं टिमटिमा सकते तारे

संदीप


'तारे ज़मीन पर' को टैक्‍स फ्री कर दिया गया। आडवाणी उस फिल्‍म को देखकर रो पड़े (ये वही आडवाणी हैं जिनकी पार्टी के मुख्‍यमंत्री के राज्‍य में गुजरात दंगों के दौरान एक गर्भवती का पेट चीरकर भ्रूण निकाल लिया गया था, लोगों को जिंदा जला दिया गया था, महिलाओं पर बलात्‍कारी पौरुष का प्रदर्शन किया गया था, और वो भी सरकारी मशीनरी और नेताओं की शह पर...और उस समय ये आडवाणी रोए नहीं थे)। अभिभावक बच्‍चों पर ध्‍यान दे रहे हैं, उनकी इच्‍छाओं को समझने का प्रयास कर रहे हैं (ये मैं नहीं कहता, ये तो 'तारे ज़मीन पर' फिल्‍म के बारे में किसी समीक्षक ने कहा था)। लेकिन क्‍या 'तारे ज़मीन पर' समस्‍या की तह में जाने का प्रयास वाकई में करती है? हालांकि, आमिर खान तो कुछ ऐसा ही दावा करते प्रतीत होते हैं, जब वे इस फिल्‍म के मुख्‍य किरदार, यानी पढ़ने-लिखने में कठिनाई महसूस करने वाले बच्‍चे, के माता-पिता से मिलते हैं। उनसे मिलने पर वे पूछते हैं कि क्‍या आपने बच्‍चे की परेशानी को समझा, और जब बच्‍चे के पिता कुछ बातें बताते हैं, तो आमिर का जवाब होता है कि आप लक्षण बता रहे हैं बीमारी नहीं। लेकिन खुद आमिर ने भी इस फिल्‍म में लक्षण ही बताया है, उसका कारण नहीं।

स्‍वयं मैं भी फिल्‍म देखते हुए सतही भावुकता की रौ में बह गया, लेकिन फिल्‍म खत्‍म होने के बाद जब मेरे भीतर का आलोचक सक्रिय हुआ तो उसने खुद मेरी सतही भावुकता के सा‍थ ही फिल्‍म के सतहीपन की चीरफाड़ करनी शुरू कर दी। और तब पता चला कि यह संवेदनशील माने जाने वाली फिल्‍म भी इस अमानवीय व्‍यवस्‍था की ही समर्थक है। एक अच्‍छी फिल्‍म या अच्‍छी कहानी, या उपन्‍यास जिंदगी की वास्‍तविक समस्‍याओं की ओर आपका ध्‍यान खींचते हैं, भले ही वे कोई रे‍डीमेड हल प्रस्‍तुत नहीं करते लेकिन ढेरों सवाल खड़ा करके आपको उन समस्‍याओं पर सोचने और उनका हल ढूंढ़ने को प्रेरित करते हैं। लेकिन ये फिल्‍म वास्‍तविक समस्‍या के बजाए लक्षणों की बात करती है।

सिर्फ खास समस्‍या के बच्‍चे ही क्‍यूं...हर बच्‍चा नये समाज की नींव है। लेकिन इस फिल्‍म में नींव के एक दो पत्‍थरों पर ध्‍यान दिया गया है। गरीबों के बच्‍चों का बचपन तो जीवित रहने और मूलभूत जरूरतों को पूरा करने में ही तिरोहित हो जाता है। लेकिन इस फिल्‍म में केवल अंत में कुछ गरीब बच्‍चों को दिखा कर जिम्‍मेदारी को पूरा मान लिया गया।

आमिर खान फिल्‍म में जगह-जगह ये तो स्‍वीकारते हैं कि ये दुनिया बेरहम है, प्रतिस्‍पर्द्धात्‍मक है, लोग डॉक्‍टर इंजीनियर बनाने से नीचे बच्‍चे के भविष्‍य के बारे में नहीं सोचते, कला और आंतरिक सौंदर्य का वास्‍तविक मूल्‍य नहीं आंका जाता। लेकिन वो भूल जाते हैं कि डॉक्‍टर, इंजीनियर और दूसरे कमाऊ धंधों (जी हां, अब डॉक्‍टर होना मानवता का सेवक होना तो है नहीं, वो तो पैसा और उसके मार्फत रुतबा कमाने का जरिया है) में उतारने की ख्‍वाहिशें इसलिए पनपती हैं कि इस व्‍यवस्‍था में, जहां मुनाफा ही भगवान है, पैसा ही मसीहा है, बिना पैसे वाला हुए कोई इज्‍जत नहीं है, चाहे वो पैसा कैसे भी आए। ऐसे मैं लोग बच्‍चों के सपनों, उनके बचपन को कुचलने के सिवा क्‍या कर सकते है। जिस समाज का आधार मुनाफा हो, उसमें हर रिश्‍ता-नाता, शिक्षा, कला, संस्‍कृति उसी मुनाफे के तर्क से संचालित होती है। लेकिन आमिर की फिल्‍म में कहीं भी इस ओर ध्‍यान नहीं दिलाया गया। दर्शक इस बारे में सोच ही नहीं पाता कि चंद लोगों के हाथों में पूरे समाज की धन-संपदा का मालिकाना सौंपनी वाली व्‍यवस्‍था में बहुसंख्‍या गरीब, निम्‍न मध्‍यवर्ग के लोग रोटी खा-कमाकर जीवित तो हैं, लेकिन जिन अमानवीय परिस्थितियों में वो रहते हैं, उसमें बच्‍चों का विकास हो ही नहीं सकता। ये फिल्‍म इस सवाल को नहीं उठाती कि तेल के स्रोत पर कब्‍जा करने के लिए अमेरिकी हमलों और प्रतिबंधों के चलते हजारों बच्‍चे भूख से मर गए, तो इसका कारण क्‍या है।

जिस समाज में हजारों बच्‍चे ढाबों, फैक्‍टरियों में काम करने को मजबूर है, वहां सारे बच्‍चे शिक्षा कैसे पा सकते हैं। और कुछ स्‍कूल तक पहुंच भी जाते हैं, तो खाली तनख्‍वाह के लिए पढ़ाने वाले अध्‍यापक बच्‍चों पर ध्‍यान क्‍यों देंगे। निजी स्‍कूल एक आम बच्‍चे की पारिवारिक समस्‍याओं के कारणों की पड़ताल क्‍यों करने लगे, उन्‍हें सिर्फ अपने स्‍कूल की इज्‍जत की परवाह होती है ताकि ज्‍यादा से ज्‍यादा पैसे वाले वहां बच्‍चों को दाखिला दिलाएं नहीं तो मुनाफा कैसे बटोरेंगे। वहां तो बच्‍चे का आत्‍मविश्‍वास वैसे ही चूर चूर हो जाता है यदि वो अपने दोस्‍तों की तरह कार में नहीं आता, मोबाइल नहीं रखता, या पिजा बर्गर नहीं खा पता। यानी मुनाफे के लिए पैदा किए गए उत्‍पादों का उपभोग नहीं कर पाता।

ऐसे समाज में मां-बाप बच्‍चे को बेहतर इंसान बनाने के बजाय उसे किसी भी तरह खूब रुतबा पैसा कमाने लायक बनाना चाहते हैं। कला साहित्‍य से ये चीजें तो मिलती नहीं। खाते-पीते मध्‍यवर्ग के लोग ही अपने बच्‍चे पर उस तरह ध्‍यान दे सकते हैं, जिस तरह आमिर खान चाहते हैं। गरीब लोग तो बस इसी की चिंता में रहते हैं कि वो और उनके बच्‍चे जिंदा कैसे रहें। वो दवा-दारू के अभाव में दम तोड़ते बच्‍चों को देखते हैं, यदि वो बच भी गया तो उनका बचपन, सपने, हसरतें तो किसी ढाबे, मोटर मैकेनिक की दुकान, फैक्‍ट्री आदि में स्‍वाहा हो जाता है। कुल मिलाकर ऐसे समाज पर यह फिल्‍म सवाल तक नहीं उठाती, जहां बचपन और बच्‍चों की यही परिणति होती है। वो बुराइयों पर तो ध्‍यान दिलाती है, लेकिन उसकी जड़ पर नहीं जिनके चलते मां-बाप, अध्‍यापक मालिकान बच्‍चों के प्र‍ति असंवेदनशील हो जाते हैं। या संवेदनाएं होती भी हैं तो बिल्‍कुल इस फिल्‍म के अभिभावकों की तरह। और समस्‍या की जड़ पर ध्‍यान देने के बजाय उसके लक्षणों को ही इलाज बताने के चलते आमिर खान की यह फिल्‍म जाने-अनजाने इस व्‍यवस्‍था का समर्थन ही करती है। यह जरूरी नहीं कि इस फिल्‍म के निर्माता-निर्देशक ने सचेतन तौर पर ऐसा किया हो, लेकिन हर विचार किसी न किसी वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करता है और यहां भी तमाम तकलीफों के बावजूद इस समूची व्‍यवस्‍था के प्रति कोई सवाल नहीं खड़ा किया जाता।

यही नहीं यह फिल् निर्देशक की समझ पर भी सवाल उठाती है। इसमें अनुशासन को बहुत बुरा बताया गया है और कुछ भी करने की छूट की पैरवी-सी की गई है। शायद आमिर को ध्यान नहीं रहा कि वीणा का तार ज्यादा कसने से टूट जाता है तो बिल्कुल ढीला रखने पर भी वीणा किसी काम की नहीं रहती। और तो और, एक दृश् में जब इशान पेंटिंग प्रतियोगिता के लिए सुबह सुबह तैयार होकर निकलता है तो, पूरे कमरे में सारे बिस्तर खाली दिखाए जाते हैं, जबकि बाद में आमिर एक बच्चे से पूछता है कि इशान कहां है तो वो बताता है कि इशान सुबह ही निकल गया था और उस समय सब बच्चे सो रहे थे। और सबसे वाहियात दृश् तो वो है जिसमें एक गाने के दौरान ढाबे पर काम करते बच्चे का मायूस चेहरा दिखाया गया है, ऐसा चित्रण वो ही निर्देशक कर सकता है जिसने दुनिया देखी हो, या देखी हो तो ट्रेन में तेजी से गुजरते दृश्यों की तरह। क्योंकि तमाम सपनों, हसरतों के बावजूद ढाबे या मोटर मैकेनिक के यहां काम करते बच्चों का चेहरा आपको इतना दयनीय नजर नहीं आएगा, इसके बजाय वो आपको हंसते-खेलते नजर आएगा, वो अपनी तकलीफ इस तरह जाहिर नहीं करता, जिंदगी उसे जीना सिखा देती है। ऐसा लगता है कि केवल दर्शकों की सहानुभूति बटोरने के लिए यह दृश् डाला गया हो, वास्तविक सरोकार होने पर ऐसे बेवकूफाना निर्देशन की उम्मीद कत्तई नहीं की जा सकती। इस फिल् में आमिर ने अचेतन तौर पर ही सही बच्चों के बेहतर भविष् के प्रति अपनी समझ का सतहीपन और कोरी भावुकता को दर्शाया है, गरीबी को बनाए रखने वाली और इस तरह बच्‍चों के सपने को कुचलने वाली इसी व्यवस्था को बनाए रखने का समर्थन ही किया है।

3.21.2007

शब्द हथियार हैं


चारों तरफ मचा हुआ है
बौ‍द्धिक झिंगुरों का शोर।

उनके जीवन में
समाजवाद की बहार है,
इन कलमघसीटों के लिए
शब्द...
महज कमाई का जरिया हैं,
लेकिन
हमारे लिए

ये शब्द‍ ही हथियार हैं।
- सर्जक