12.13.2007

दो छोटी कविताएं

शशिप्रकाश की कविताएं पढ़ रहा हूं इन दिनों। ये दो छोटी कविताएं अच्छी लगीं...उम्मीद है आपको भी पसंद आएंगी...


अपनी जड़ों को कोसता नहीं
उखड़ा हुआ चिनार का दरख्त।
सरू नहीं गाते शोकगीत।
अपने बलशाली होने का
दम नहीं भरता बलूत।
घर बैठने के बाद ही
क्रान्तिकारी लिखते हैं
आत्मकथाएं

और आत्मा की पराजय के बाद

वे बन जाते हैं
राजनीतिक सलाहकार।

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सबसे अहम बात यह है
कि हमारे पैर नहीं हैं
घिसे हुए जूते।
हमारे लोग नहीं हैं
अंगोरा खरगोश।
हम ऐसे आतुर चक्के नहीं हैं
जिन्हें एक खड़-खड़ करती
ज़ंग लगी चेन भी
घुमा सके
अपनी मर्जी के मुताबिक।


* शशिप्रकाश

1 comment:

vimal verma said...

शशिप्रकाश ने कुछ बेहतरीन जनवादी गीत लिखे है जिसे एक ज़माना हो गया हम गाया करते थे, ज़िन्दगी लड़ती रहेगी,गाती रहेगी
नदियां बहती रहेंगी
कारवां चलता रहेगा
इस गीत को हमने खूब गाया है
शुक्रिया आपका, मै तो शशि जी के नाम पर आपके यहां आया था अच्छा लगा।