
प्रेम... यह शब्द सुनते ही मन के समंदर में कई विचार और अनुभव डूबते-उतराने लगते हैं...कितनी ही उम्र क्यों न हो...प्रेम कहानियां सबको रोमांचित करती हैं...और करती रहेंगी...चाहे कोई भी युग हो कोई भी देश....लैला-मजनूं, हीर-रांझा, रोमियो-जूलियट जैसी तमाम कहानियां सदियों से चली आ रही हैं...लेकिन आज मैंने एक कहानी सुनी...एक प्रेम कहानी, और मानवीय त्रासदी की दास्तान....जिसमें न तो खलनायक है, न बैरी जमाना। बस संवेदनाएं हैं, और तकलीफ। और हां! जो इसमें छिपा है शायद उसी को कहा जाता हो - सच्चा प्रेम!
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दुनिया के किसी कोने में एक लड़की रहती थी...हर लड़की की तरह उसके भी कुछ अरमान थे...वह भी सपने देखा करती थी, लेकिन मन की आंखों से। हां, मन की आंखों से... क्योंकि वह देख नहीं सकती थी। शायद यही वजह थी कि वह सबसे नफरत करने लगी थी, सिवाय अपने प्रेमी के।
वह उससे अक्सर कहा करती, ''यदि मैं तुम्हें देख पाती तो मैं निश्चित ही तुमसे शादी कर लेती।''...
एक दिन अचानक यूं हुआ कि किसी ने उस लड़की के जीवन में रंग भर दिए, उसे अपनी आंखें दान करके....। अब वह देख सकती थी...उसे सब कुछ खूबसूरत लगने लगा था...। लेकिन जब उसने अपने प्रेमी को देखा तो ऊंची उड़ान भरता उसकी कल्पनाओं का परिंदा धम्म से नीचे आ गिरा...।
उसका प्रेमी भी अंधा था...।
जब उसके प्रेमी ने उससे पूछा, ''क्या अब तुम मुझसे शादी करोगी?''
लड़की ने, जो अब देख सकती थी, बेहद रूखे ढंग से जवाब दिया, ''नहीं...! ''
यह सुनकर उसका प्रेमी अपने चेहरे पर मुस्कुराहट लिए वहां से चल दिया...और जाते-जाते केवल इतना कहा,
''मेरी आंखों का ख्याल रखना प्रिय...!''
(यह कहानी मैंने ऑर्कुट पर रेयाज़-उल-हक़ जी के स्क्रैपबुक में पढ़ी थी, किन्हीं ताया ने वहां लिखी थी। पता नहीं इसके वास्तविक लेखक कौन हैं। बस दिल को छू गई और हिंदी में अनुवाद करके आप तक पहुंचा रहा हूं।)