7.12.2009

उपलब्धियां हो तो श्रीधरन साहब की, वरना ठेकेदार कंपनी जिम्मेदार

अच्छा-अच्छा हमारा, और बुरा हो तो...। श्रीधरन साहब! गड़बड़ भी होगी तो मेट्रो प्रशासन और आप ही मुख्य तौर पर जिम्मे्दार होंगे।
जी हां, दिल्ली् मेट्रो में हादसे के बाद बयानबाजियां और श्रीधरन जी के इस्तीफे की नौटंकी (जिसे उम्मीद के अनुसार शीला दीक्षित ने नामंजूर कर दिया है) के बीच असली मुद्दा दब-सा गया। अभी तक दिल्ली मेट्रो के निर्माण या मेट्रो प्रचालन और परिसर में जितनी दुर्घटनाएं हुई हैं, उनके लिए निर्माण कंपनी, घायल व्‍यक्ति आदि को ही जिम्मे्दार ठहराया गया। आज भी श्रीधरन साहब ने ''नैतिक'' जिम्मेदारी तो ली, लेकिन साफ शब्दों में यह नहीं कहा कि अब तक हुई सभी दुर्घटनाओं की मुख्य जिम्मेदारी मेट्रो प्रशासन की है। यहां तक कि मेट्रो के प्रवक्ता और दिल्ली की मुख्यमंत्री तक ने सारी जिम्मेदारी गैमन इंडिया नाम की कंपनी पर डाल दी। लेकिन इस दुर्घटना सहित अब तक मेट्रो संबधी सभी दुर्घटनाओं और मौतों का मुख्य जिम्मेदार मेट्रो प्रशासन है।
श्रम कानूनों के अनुसार मज़दूरों, कर्मचारियों की सुरक्षा के साथ ही श्रम कानूनों के अमल की जिम्मेदारी भी प्रथम नियोक्ता की होती है, जो इस स्थिति में मेट्रो प्रशासन है। मेट्रों के कर्मचारियों के एक संगठन 'दिल्लीं मेट्रो कामगार संघर्ष समिति' ने आरटीआई दाखिल करके इस बारे में जानकारी मांगी तो मेट्रो प्रशासन ने स्वीकार किया कि मुख्य जिम्मेदारी मेट्रो प्रशासन की ही बनेगी। भले ही कर्मचारियों, मजदूरों की भर्ती ठेका कंपनी के जरिए हुई हो। ऐसे में इस घटना की जिम्मेदारी का पता लगाने के लिए जांच कमेटी बिठाने से पहले श्रीधरन साहब को स्पष्ट शब्दों में कहना चाहिए था कि इस घटना का जिम्मेदार मेट्रो प्रशासन है, जो उन्होंने नहीं कहा।
यही नहीं, इस घटना में भी जो मौत हुई हैं, उनकी मुख्य वजह सिर में लगी चोट रही। यदि मजदूरों को इंडस्ट्रियल हैलमेट दिए जाते तो मौत की संभावना कम होती। फिलहाल उन्हें जो टोपीनुमा चीज दी गई उस पर एक ईंट भी गिर जाये तो टूट जाएगी तो वह पिलर का वजन कैसे सह सकती थीं।
घटना के बाद श्रीधरन साहब ने जो प्रेसवार्ता बुलायी और उसमें अपने अनुभव का पूरा फायदा उठाते हुए 'इस्तीफा' नाम का तुरुप का पत्ता फेंक दिया। चिंता की बात यह है कि जो मीडिया उन्हें घेरने के लिए तैयार दिख रहा था, वह द्रवित हो उठा और कई पत्रकारों ने यहां तक कह डाला कि श्रीधरन साहब पूरा देश आपकी ओर उम्मीद से देख रहा है, कॉमनवेल्थ गेम होने वाले हैं, आप इस्तीफा क्यों दे रहे हैं।... और इस सब में दुर्घटना की जिम्मेदारी और उसके कारणों पर सवाल ही नहीं उठा, एक आध सवाल आए भी तो दबे से स्वर में। यानी मीडिया को भी श्रीधरन साहब ने बना ही दिया और असल मुद्दा गुम हो गया इस्तीफे के शोर में।

5.09.2009

दिल्‍ली मेट्रो : आन्‍दोलनरत मेट्रो कर्मियों को काम से निकाला

बुनियादी मांगों को लेकर आन्‍दोलन कर रहे 30 मेट्रोकर्मियों को काम से निकाल दिया गया है। दिल्‍ली मेट्रो रेल प्रबंधकों और ठेकेदारों के इस तानाशाहीपूर्ण रवैये से नाराज कर्मचारियों ने आन्‍दोलन को तेज करने की चेतावनी दी है। कर्मचारियों ने शुक्रवार को डीएमआरसी को ज्ञापन भी सौंपा। इसके अतिरिक्‍त कर्मचारियों ने श्रम कार्यालय में भी शिकायत दर्ज कराई है।
दिल्‍ली मेट्रो के ठेके पर काम कर रहे कर्मचारियों की बुनियादी मांगों को लेकर चल रहे आन्‍दोलन को हर तरह से कुचलने की कोशिश हो रही है। पांच मई को अपनी बुनियादी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे करीब 43 कर्मचारियों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया था।
इनमें मेट्रो फीडर सेवा के चालक-परिचालक और मेट्रो के सफाईकर्मी शामिल थे। तमाम प्रयासों से छह मई रात को जेल से रिहा होने के बाद इनकी कानूनी मांगों की सुनवाई के बजाय इनका उत्‍पीड़न शुरू हो गया। मेट्रो कामगार संघर्ष समिति के संयोजक अजय स्‍वामी ने बताया कि
प्रदर्शन में शामिल मजदूर जमानत पर छूटने के बाद शुक्रवार को जब काम पर पहुंचे तो मेट्रोफीडर सेवा के इन 30 कर्मचारियों के नाम की सूची डिपो के बाहर लगी मिली। इस पर लिखा था ' नो ड्यूटी'

उन्‍होंने कहा कि इन कर्मचारियों को काम से निकाल दिया गया है साथ ही जो कर्मचारी पांच मई को छुट्टी पर थे, उन पर पांच सौ रुपये का जुर्माना लगाया गया है। अजन ने डीएमआरसी के और ठेकेदार कंपनी के इस तानाशाही रवैये की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि हमारी जायज मांगों को न मान कर डीएमआरसी और ठेकेदार कंपनियां अपने मजदूर विरोधी रवैये का परिचय दे रही हैं।
उधर डीएमआरसी सारी जिम्‍मेदारी ठेकेदार कंपनियों पर डाल रही है, जबकि कानूनन प्रथम नियोक्‍ता वही है। और श्रम कानूनों को लागू कराने की जिम्‍मेदारी भी डीएमआरसी है।
खैर, डीएमआरसी की इन हरकतों से जो भी मेट्रो की चमक दमक और गति को बरकरार रखने वाले कर्मचारियों के साथ उसके तानाशाही रवैये का खुलासा हो रहा है। अब जरूरत यह है हर जागरूक नागरिक मेट्रो कर्मचारियों के इस जायज आन्‍दोलन का समर्थन करे।

5.07.2009

दिल्‍ली मेट्रो : छात्र, पत्रकार, वकील और आम नागरिकों ने कर्मचारियों को रिहा कराया

मेरी पिछली पोस्‍ट से आपको पता चला होगा कि 5 तारीख को दिल्‍ली मेट्रो प्रशासन के इशारे पर अपनी बुनियादी मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे 45 कर्मचारियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। कल यानी 6 तारीख को छात्रों, वकील, पत्रकारों, और आम नागरिकों ने जमानत देकर उन्‍हें रिहा करा लिया।
गिरफ्तार कर्मचारियों में मेट्रो के सफाईकर्मी, और फीडर सर्विस के चालक-परिचालक शामिल थे। जेल से रिहा होने के बाद मेट्रो कामगार संघर्ष समिति के संयोजक अजय ने कहा कि ठेका मजदूरों का आन्‍दोलन व्‍यापक रूप लेता जा रहा है। उनका कहना है कि यूं तो डीएमआरसी ने हर स्‍टेशन डिपो के बाहर बोर्ड टांग रखा है कि यहां सभी श्रम कानूनों का पालन किया जाता है, लेकिन सच्‍चाई यह है कि डीएमआरसी अपने मजदूरों को न्‍यूनतम मजदूरी, ई.एस.आई., पी.एफ. जैसी सुविधाएं तक नहीं देती और साप्‍ताहिक अवकाश तो दूर की बात है। यहां तक कि सभी श्रम कानूनों को ताक पर रख कर मजदूरों से 16 16 घंटे तक काम कराया जाता है। उन्‍होंने कहा कि मेट्रो के कर्मचारी इस संघर्ष को जीतने तक इसे आन्‍दोलन और कानूनी तरीके से जारी रखेंगे।

5.05.2009

दिल्‍ली मेट्रो: बुनियादी मांगों के लिए संघर्षरत 100 मजदूरों को गिरफ्तार किया

दिल्‍ली मेट्रो की मनमानी जारी है। पिछले तीन महीनों से दिल्‍ली मेट्रो के कर्मचारी अपनी बुनियादी मांगों के लिए लगातार संघर्षरत थे, लेकिन मेट्रो प्रशासन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। आज लगभग 11:30 बजे जब मेट्रो के कर्मचारी मेट्रो भवन के सामने प्रदर्शन कर रहे थे, तो मेट्रो के इशारे पर दिल्‍ली पुलिस ने लगभग 100 कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया। इन्‍हें फिलहाल दिल्‍ली के कनॉट प्‍लेस थाने ले जाया गया है।
मेट्रो कामगार संघर्ष समिति के बैनर तले ये कर्मचारी तीन महीने से मेट्रो प्रशासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। और कर्मचारियों के अनुसार इस पूरे मामले में मेट्रो प्रशासन तानाशाह रवैया अपनाता रहा है। पिछली 25 मार्च को भी कर्मचारियों ने मेट्रो भवन के सामने प्रदर्शन करके अपनी मांगों का ज्ञापन सौंपा था, जिसे मेट्रो प्रशासन ने काफी हील-हुज्‍जत के बाद लिया था।
मेट्रो कामगार संघर्ष समिति के अनुसार, ठेके पर काम करने वाले मेट्रो के 3000 सफाईकर्मी और फीडर सेवा कर्मचारियों को न्‍यूनतम मजदूरी, साप्‍ताहिक अवकाश, ईएसआई, पीएफ आदि जैसे बुनियादी अधिकार नहीं दिए जा रहे हैं। और अपने कानूनी अधिकारों की मांग करने पर उन्‍हें डराया, धमकाया जा रहा है और यहां तक कि नौकरी से भी निकाला जा रहा है।